लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवर्गकरणप्रकारः । ( १९ ) कारण विषम अंकोंके ऊपर ( ' ) ऐसा चिह्न देना चाहिये और सम अंकके ऊपर ( - ) ऐसा चिह्न देना चाहिये. वर्गमूल निकालनेमें राशिमें जितने अंक विषम होते हैं उतनेही अंक मूलमें नियत करके आते हैं ॥ न्यासः-४।९ । ८।१।९६ । ८८२०९ । १००१०००२५ लब्धानि क्रमेण मूलानि २। ३। ९। ९४। २९७। १०००५ ॥ (क) उपरोक्त रीतिके अनुसार ४' का वर्गमूल २ दो होता है. क्योंकि दोका ही वर्ग घटता है. फिर अंक निःशेष होजाते हैं ॥ (ख) उसी रीतिके अनुसार ९' नौका वर्गमूल ३ तीन होता है क्योंकि तीन का ही वर्ग घटनेपर राशि निःशेष हो जाती है ॥ (ग) तथा ८'१' इक्यासीका वर्गमूल निकालना है ॥ यहाँ अन्त्य विषम इक्यासी ही है. उसमें नौका वर्ग घटानेसे राशि निःशेष हो जाती है इस कारण वर्गमूल ९ नौ ही होता है ॥ (घ) तथा ८'८२'०९' यहाँ पूर्वोक्त रीतिके अनुसार अन्तके विषम अंक ८' आठमें दोका २ वर्ग घटाया. अर्थात् चार ४ घटाया. तब ४ चार शेष रहे. उनके ऊपर सम अंक ८ आठ आया इसकारण ४८ अडतालीस सम हुआ. और जिन दो २ का वर्ग विषम अंकमें घटाया था उस मूल दो २ को द्विगुणा करके एक स्थानमें अलग रख दिया उसीका नाम पंक्ति है फिर उस पंक्तिमें वर्गराशि मूल पंक्ति रखे हुए ४ चारका सम अङ्क ८८२०९ २ ४ ४८ में भाग दिया तब ९ नौ ४ ८ लब्धि हुए यद्यपि ज्यादा लब्धि ४ ) ४८ ( ९ जोड ५८ हो सकती हैः परन्तु आगे वर्ग ३६ १४ घटाना है इस कारण ९ बार ही १२२ जोड ५९४ भाग लिया तब ४८ मे छत्तीस ८१ भाग ३६ घटनेसे १२ बारह बाकी ५८ ) ४१० ( ७ २ ) ५९४ ( २९७ रहे उसपर विषम अङ्क २ दो ४०६ ४ फल उतारा तो १२२ एकसौ बाईस ४९ १९ हुए. इसमें समांकमें भाग देनेसे ४९ १८ लब्धि मिले हुए नौका वर्ग घटाया ०० १०४ तब १२२ में ८१ इक्यासी १४ ०० घटनेसें ४१ इकतालीस शेष रहे और जिसका वर्ग घटाया उस ९ को द्विगुणा करके १८ को पंक्तिमें एकस्थान बढाकर रक्खा जोडनेसे पंक्ति ५८ अठ्ठावन हुई. फिर शेष ४१ के ऊपर सम अङ्क शून्य आया तब ४१० चारसौ दश सम अंक हुआ. इसमें