भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( १८ ) लीलावती । वर्गमूले करणसूत्रं वृत्तम्-- वर्गमूल करनेका सूत्र श्लोक १ (सू०१४) त्यक्त्वान्त्याद्विषमात्कृतिं द्विगुणयेन्मूलं समे तद्धृते त्यक्त्वा लब्धकृतिं तदाद्यविषमाल्लब्धं द्विनिघ्नं न्यसेत् ॥ पंक्त्यां पंक्तिहते समेऽन्त्यविषमात्त्यक्त्वाप्तवर्गं फलम् पंक्त्यां तद्द्विगुणं न्यसेदिति मुहुः पंक्तेर्दलं स्यात्पदम् ॥ १० ॥ अन्वयः-गणकः अन्त्यात् विषमात् कृतिं त्यक्त्वा मूलं द्विगुणयेत् समे तद्धृते सति तदाद्यविषमात् लब्धकृतिं त्यक्त्वा लब्धं द्विनिघ्नम् पंक्त्यां न्यसेत् । समे पंक्ति- हते सति अन्त्यविषमात् आप्तवर्गं त्यक्त्वा तत् फलं द्विगुणम् पंक्त्यां न्यसेत् । इति मुहुः कुर्यात् तदा पंक्तेः दलम् पदं स्यात् ॥ १० ॥ अर्थः-गणक वर्गराशिमें अन्त्यके विषम अंकमें किसी अंकका वर्ग घटावै फिर जिस अंकका वर्ग घटाया है; उसको द्विगुणा करके एक स्थानमें रखदेय उसको पंक्ति कहते हैं, फिर उस द्विगुणित मूलका विषमके धोरेके सम अंकमें भाग देय जो लब्धि मिले उसका वर्ग उसी समके समीपके विषममें घटा देय जिस अंकका वर्ग घटाया हो उसको द्विगुणा करके पंक्तिमें एक स्थान बढाकर रख देय, फिर उसी पंक्तिका विषमके समीपके सम अंकमें भाग देय जो लब्धि होय उसका वर्ग समी- पके विषम अंकमें घटा देय, मूलको द्विगुणा करके पंक्तिमें एक स्थान बढाकर रक्खे इस प्रकार जब तक अंक निःशेष हों तबतक क्रिया करे, फिर पंक्तिके सब अंकोंको जोडकर दो २ का भाग देय अर्थात् आधा करलेय तो वर्गफल प्राप्त होता है ॥ १० ॥ अत्रोद्देशकः-वर्गमूलके विषयमें उदाहरण । मूलं चतुर्णां च तथा नवानां पूर्वं कृतानाञ्च सखे कृतीनाम् ॥ पृथक्पृथग्वर्गपदानि विद्धि बुद्धेर्विवृद्धिर्यदि तेऽत्र जाता ॥ ४ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यदि अत्र ते बुद्धेः विवृद्धिः जाता तर्हि चतुर्णां नवानाञ्च मूलम्; तथा पूर्वं कृतानां कृतीनां च वर्गपदानि पृथक् पृथक् विद्धि ॥ ४ ॥ अर्थः-हे प्रिये लीलावति ! जो वर्गमूल करनेमें तुम्हारी बुद्धि बढी हुई है तो ४ और ९ नौका वर्गमूल तथा पहले किये हुए वर्गोंका भी वर्गमूल अलग अलग कहो ॥ फैलाव-अंकोंकी गिनती ऊपरकी तरफसे होती है और उधरसे ही आदि कहा- वती है, पहला, तीसरा, पाँचवाँ इत्यादि अंक विषम कहाते हैं और दूसरा चौथा छठा और आठवाँ इत्यादि अंक सम कहाते हैं; वर्गमूल निकाले तो स्मरणके

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