लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रभागाजातिप्रकारः । ( ३१ ) अन्वयः--एकस्य भागाः अधिकोनकाः चेत् तदा छेदघ्नरूपेषु लवाः धनर्णं कार्याः ॥ २ ॥ खसु यत्र भागानुबन्धे लवापवाहे वा एकस्य भागः स्वांशाधिकोनः स्यात् । तत्र तलस्थहारेण हरं निहन्यात् स्वांशाधिकोनेन तेन तु भागान् निहन्यात् ॥ ३ ॥ अर्थः--यदि किसी एक रूपका भाग अधिक हो अथवा हीन हो तब रूपको हरसे गुणा करके यदि रूपका भाग अधिक हो, तब तो गुणित अंकोंको अंशमें जोडकर (धन करके) अंशके स्थानमें लिखे और हर पूर्वोक्त ही रक्खे और यदि रूपका भाग हीन हो तो गुणित अंकोंमें अंशको घटाकर (ऋण करके) अंशके स्थानमें लिखे और हर वही रहता है। यह रीति भागानुबन्ध तथा भागापवाह करनेकी है॥ और जहां भागानुबन्धमें अथवा भागापवाहमें किसी रूपका भाग अपने किसी भागसे अधिक हो अथवा न्यून हो, वहां सबसे तलेके हरसे सबसे ऊपरके हरको गुणा करे, यदि भागका भाग अधिक हो तब तो सबसे नीचेके हरमें अपने अंशको जोडकर सबसे ऊपरके अंशको गुणा करे और यदि भागका भाग हीन हो तो सबसे नीचेके हरमें अपना अंश घटाकर उससे सबसे ऊपरके अंशको गुणा करनेसे भागानुबन्ध तथा भागापवाह होता है ॥ ३ ॥ अत्रोद्देशकः-- भागानुबन्ध तथा भागापवाहके विषयमें उदाहरण-- साङ्घ्रि द्वयं त्रयं व्यङ्घ्रि कीदृग्ब्रूहि सवर्णितम् ॥ जानास्यंशानुबन्धं चेत्तथा भागापवाहनम् ॥ ३ ॥ अन्वयः--हे सखे ! चेत् अंशानुबन्धं तथा भागापवाहं जानासि तर्हि साङ्घ्रि द्वयम् व्यङ्घ्रि त्रयम् सवर्णितं कीदृग् भवति इति ब्रूहि ॥ ३ ॥ अर्थः--हे मित्र ! यदि भागानुबन्ध तथा भागापवाहको जानतेहो तो अपने चतुर्थांशसहित रूप दो २ १/४ और अपने चतुर्थांशहीन रूप तीन ३ १/०४ सवर्णन करनेसे कैसा होता है सो कहो ॥ ३ ॥ न्यासः--२ १/४, ३ १/०४ सवर्णिते जातम् ९/४, ११/४ फैलाव--उपरोक्त पहली रीति के अनुसार २ १/४ का भागानुबन्ध किया अर्थात् हर ४ चारसे रूप२दो को गुणा किया तब ८ आठ हुआ. अब यहां भाग अधिक है, इस कारण आठमें अंश १ एक को जोड दिया तब ९ नौ हुए. यह अंशके स्थानमें रक्खा और हर वही ४ रहा. यही पूर्वोक्त राशिका भागानुबन्ध हुआ ॥ ३ १/०४ यहां हर ४ चार है उससे रूप ३ तीनको गुणा किया तब बारह १२ हुए. यहां भाग हीन है, इसकारण पूर्वोक्त नियमानुसार १२ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri