भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( ३० ) लीलावती । अन्वयः-हे सुमते ! सम्प्रार्थितेन येन कदर्येण द्रम्मार्द्धत्रिलवद्वयस्य यत् पादत्रयं भवेत् । तत्पञ्चांशकषोडशांशचरणः अर्थिने दत्तः । यदि गणिते प्रभागाभिधां जातिं वेत्सि तर्हि हे वत्स ! तेन कति वराटकाः अर्पिताः इति मे ब्रूहि ॥ २ ॥ अर्थः-हे सुबुद्धे ! याचना किये हुए जिस कृपणने १ द्रम्मके १/२ आधेके द्विगुणित तृतीयभाग २/३ का जो त्रिगुणित चतुर्थांश ३/४ होता है, उसके पञ्चमांश १/५ के षोडशांश १/१६ का चतुर्थांश १/४ दिया. यदि गणित शास्त्रमें प्रभागजातिको जानते हो तो हे पुत्र ! उस कृपणने कितनी कौडी याचकको दी सो कहो ॥ न्यास-- १/१ १/२ २/३ ३/४ १/५ १/१६ १/४ सवर्णिते जातम् ६/७६८० षड्भिरपवर्तिते जातम्- १/१२८० एको दत्तो वराटकः ॥ इति प्रभागजातिः ॥ फैलाव-जिस राशिके नीचे हर नहीं होता है उसके नीचे एक हर कल्पना कर लिया जाता है, इसकारण द्रम्म १ एक है, उसके नीचे एक १/१ हर कल्पना किया, फिर उपरोक्त नियमानुसार सब १/१ १/२ २/३ १/५ १/१६ १/४ राशियोंके अंशोंको परस्पर गुणा किया, तब ६ छः हुए. फिर सब हरोंको परस्पर गुणा किया, अर्थात् २ दोको ३ तीन से गुणा किया तब ६ छ हुए. छ को ४ चारसे गुणा किया तब २४ चौबीस हुए. २४ को ५ पांच से गुणा किया तब १२० एकसौ बीस हुए १२० को १६ सोलहसे गुणा किया तब १९२० एक हजार नौसौ बीस हुए १९२० को ४ चारसे गुणा किया तब ७६८० सात हजार छहसौ अस्सी हुए. यही सब हरोंका गुणा हुआ तब ६/७६८० ऐसा रूप हुआ. इसमें ६ छ का अपवर्तन दिया तब १/१२८० ऐसा स्वरूप हुआ. अर्थात् १ एक द्रम्मका एक हजार दोसौ अस्सीवाँ भाग दिया. यहां कौड़ियोंका उत्तर बूझा है, इसकारण एक द्रम्मकी कौडी करीं तब १२८० एक हजार दोसौ अस्सी कौडी हुईं. इसमें हर १२८० का भाग दिया तब एक १ लब्धि हुआ. अर्थात् एक १ कौडी दिया ॥ अथ भागानुबन्धभागापवाहयोः करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्-- भागानुबन्ध और भागापवाह करनेकी रीति डेढ श्लोकमें- छेदघ्नरूपेषु लवा धनर्णमेकस्य भागा अधिको-- नकाश्चेत् ॥ २ ॥ स्वांशाधिकोनः खलु यत्र तत्र भागानुबन्धे च लवापवाहे ॥ तलस्थहारेण हरं निहन्यात्स्वांशाधिकोनेन तु तेन भागान् ॥ ३ ॥