भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( २२ ) लीलावती । अत्रोद्देशकः- घन करनेके विषयमें उदाहरण. नवघनं त्रिघनस्य घनं तथा कथय पञ्चघनस्य घनञ्च मे ॥ घनपदञ्च ततोऽपि घनात्सखे यदि घनेऽस्ति घना भवतो मतिः ॥ ५ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यदि घने भवतः मतिः घना अस्ति तदा नवघनम् । त्रिघनस्य घनम् । तथा पञ्चघनस्य घनंच । ततः घनपदं च मे कथय ॥ ५ ॥ अर्थः-हे मित्र ! यदि तुम्हारी बुद्धिघन करनेमें सघन है तो ९ नौका घन तथा तीनके घन २७ का घन और पाँचके घनका १२५ घन तथा इनही घन करी हुई राशियोंका घनमूल भी कहो ॥ ५ ॥ न्यासः-९ । २७ । १२५ । जाताः क्रमेण घनाः ७२९ । १९६८३ । १९५३१२५ । फैलाव-पूर्वोक्त रीतिके अनुसार ९ कौ ९ नौसे दोवार गुणा किया तो फल ९ | सातसौ उनतीस हुआ ॥ ९ | ( ख )अब सत्ताईस २७का वर्ग करना है. यहाँ दूसरी रीतिके अनुसार ८१ | अन्तके अंकका घन किया तौ ८ आठ हुआ. उसको एक स्थानमें रख दिया ९ | फिर अन्तके अंक २ का वर्ग किया तो ४ हुए. उसको आदिके अंक ७सातसे ७२९ गुणा किया तो २८ अट्ठाईस हुए.उनको तीन से गुणा किया तो ८४ चौरासी हुए. इनको ८ आठके नीचे एक स्थान बढाकर रक्खा. फिर आदिके अंक ७ सातका वर्ग किया तो ४९ उनचास मूलराशि अन्त २ का घन | पंक्ति हुआ उसको तीन ३ से गुणा २७ ८ | ८ किया, तब १४७ एकसौ सैंता अन्तका वर्ग | ८४ लिस हुए. उनको अन्तके अंक आदि और ३ से | २९४ २ से गुणा किया तब २९४ गुणा किया हुआ | ३४३ दोसौ चौरानवे हुए. उनको ८४ | १९६८३ जोड. पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा आदि७ का वर्ग ३ से और अन्तके | यही २७का घन हु. फिर आदिके अंक ७ सातका अंक २ से गुणा किया हुआ | घन किया तब ३४३ तिनसौ २९४ | आदिके अंक ७ सातका घन ३४३.