भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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घनकरणप्रकारः । (२३) तैंतालीस हुआ उसको भी पंक्तिमें एक स्थान बढाकर रक्खा फिर जोड देनेसे जो राशि हुआ वही ४७ सत्ताईसका घन है ॥ (ग) इसी प्रकार १२५ एकसौ पचीसका घन करना है यहाँ आदिके दो अंकोंको अन्तका और आदिका माना तब अन्तका अंक जो १ एक है उसका वर्ग किया तब १ एक ही हुआ. उसको एक स्थानमें लिखा फिर अन्तके अंक १ एकका वर्ग किया तब एक १ ही रहा. उसको आदिके अंक दो २ से गुणा किया तब दो २ हुए. उनको तीनसे गुणा किया तब ६ हुए. उनको पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा. फिर आदिके अंक २ दोका वर्ग किया तब ४ चार हुए. उसको तीन ३ से गुणा किया, मूलराशि अन्तका घन | १२५। अन्तका घन. १२५ १ | १७२८ अन्तका वर्ग आदि और ३ से गुणा | अन्तका वर्ग आदि और तीन ३ से किया हुआ ६ | गुणा किया हुआ २१६० आदिके अंकका वर्ग अन्त और ३ से | आदिका वर्ग अन्त और ३ से गुणा- गुणा किया हुआ १२ | किया हुआ ९०० आदिके अंकका घन ८ | आदिका घन १२५ पंक्ति | पंक्ति १ | १७२८ ६ | २१६० १२ | ९०० ८ | १२५ १७२८ | १९५३१२५ जोड. तब १२ बारह हुआ. उसको पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा फिर आदिके अंक दो २ का घन किया तो आठ हुए इनको भी पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा और जोड दिया तो १२ बारहका घन निकला, अब एक १ अंक बाकी रह गया इसकारण अन्त अंक १२ को माना और आदि अंक पांच ५ को माना. पूर्वोक्त रीतिके अनुसार अन्त्य अंक १२ बारहका घन तो निकाल ही चुके. फिर बारहका वर्ग किया तब १४४ एकसौ चौवालीस हुआ. उसको तीन ३ से गुणा किया तब ४३२ चारसौ बत्तीस हुआ. उसको आदि अंक पांच ५ से गुणा किया तब २१६० दो हजार एकसौ साठ हुआ इनको पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा, फिर आदिके अंक पांच ५ का वर्ग किया तब २५ पचीस हुआ, उसको तीनसे गुणा किया तो ७५ पचहत्तर हुआ उसको अन्तके अंक १२ बारहसे गुणा किया तो ९०० नौ सौ हुए. इनको एक स्थान बढाकर पंक्तिमें लिखा, फिर आदिके अंक ५ पांच का घन किया तब १२५