लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४ ) लीलावती । एकसौ पचीस हुआ. इसको भी पंक्तिमें एकस्थान बढाकर लिखा फिर जोडनेसे जो राशि हुआ वही १२५ का घन है ॥ अथवा आदि अंककी तरफसे घन करनेसे भी वही फल प्राप्त होता है परन्तु उलटी तरफसे किया जाता है इसकारण एक एक स्थान १२५ पीछे हटाकर सब अंक जोडे जाते हैं और जहाँ जो कार्य ९०० आदिके अंकसे लिखा है वह अन्तके अंकसे लिया जाता है २१६० और जो कार्य्य अन्तके अंकसे लिखा है वह आदिसे लिया ००८ जाता है ॥ ७१२ जोड. ०६ १
१९५३१२५ घन करनेकी तीसरी रीति । खण्डाभ्यां वा हतो राशिस्त्रिघ्नः खण्डघनैैक्ययुक् ॥ अन्वयः-वा खण्डाभ्यां हतः राशिः त्रिघ्नः खण्डघनैैक्ययुक् राशिः घनः स्यात् ॥ अर्थः-अथवा जिस राशिका घन करना हो उसके दो खण्ड करे. उनसे राशिको गुणा करके तीन ३ से गुणा करे फिर दोनों खण्डोंका अलग २ घन करके पहली राशिमें जोडनेसे जो राशि होती है वह घन कहाता है ॥ राशिः ९ अस्य खण्डे ४ । ५ आभ्यां राशिर्हतः १८० त्रिन्निघ्नश्च ५४० खण्डघनैैक्येन १८९ युतो जातो घनः ७२९ ॥ फैलाव-उपरोक्त नियमानुसार राशि ९ राशि. दो खण्ड. नौके ४ । ५ चार और पांच दोखण्ड किये ९ ४ । ५ फिर प्रथम पहले खण्ड चार ४ से राशि ९ नौको [पहले] ४ ९ पहले खण्डसे गुणा किया तो ३६ छत्तीस हुआ.उसको द्वितीय [खण्डका] ४ ४ खण्ड पांच ५ से गुणा किया तब १८० एकसौ [घन] १६ ३६ राशिका गुणा अस्सी हुआ. इसको तीन ३ से गुणा किया तब ४ ५ ५४० पांचसौ चालीस हुआ. फिर दोनों खण्डोंका ६४ १८० दूसरे ख० रा० गु० अलग २ घन किया अर्थात चारका ४ का घन [दूसरे] ५ ३ तीनसे गुणा किया तब ६४ चौंसठ हुआ और पांचका घन [खण्डका] ५ ५४० किया तब १२५ एकसौ पचीस हुआ. इनको [घन] २५ ५४० ५ ६४ १२५ १२५ ७२९ जोड पहली गुणा करी हुई राशिमें जोडा तब घनफल होता है ॥