लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघनकरणप्रकारः। (२५) अथवा राशिः २७ अस्य खण्डे २० । ७ आभ्यां हतस्त्रिघ्नश्च ११३४० खण्डघनैक्येन ८३४३ युतो जातो घनः १९६८३ फैलाव- उपरोक्त नियमानुसार राशि २७ सत्ताईसके २० । बीस और ७ सात दो खण्ड किये फिर प्रथम पहले खण्ड २० बीससे राशि २७ को गुणा किया तब ५४० पाँचसौ चालीस हुए फिर दूसरे खण्ड ७ सातसे गुणा किया तब ३७८० तीन हजार सातसौ अस्सी हुए. उनको तीन [vertical-col-1: राशि २७ २० २० ४०० २० ८००० ७ ७ ४९ ७ ३४३] [vertical-col-label-1: पहिले खण्डका घन] [vertical-col-label-2: दूसरे खण्डका घन] [col-right: दो खण्ड २० । ७ २७ पहले खंडसे २० राशिका गुणा ५४० दूसरे खंडसे ७ राशिका गुणा ३७८० ३ तीनसे गुणा. ११३४० ११३४० ८००० ३४३ १९६८३ जोड] ३ से गुणा किया तब ११३४० ग्यारह हजार तीनसौ चालीस हुए फिर पहले खण्ड २० बीसका घन किया तब ८००० आठ हजार हुआ और दूसरे खण्डका घन ३४३ तीनसौ तेतालीस हुआ. इन दोनों खण्डोंके घनको पहली तीनसे गुणा करी हुई राशि में जोडा तब घन फल होता है. घन करनेकी और रीति. वर्गमूलघनः स्वघ्नो वर्गराशेर्घनो भवेत् ॥ १३ ॥ अन्वयः-स्वघ्नोः वर्गमूलघनः वर्गराशेः घनः भवेत् ॥ १३ ॥ अर्थः-वर्गमूलका घन अपनेसे अर्थात् जितने अङ्क हों उतनेहीसे गुणा किया हुआ वर्गराशिका घन हो जाता है ॥ राशिः ४ अस्य मूलं २ घनः ८ अयं स्वघ्नो जातश्चतुर्णां घनः ६४ फैलाव-उपरोक्त रीतिके अनुसार वर्गराशि ४ चार है इसका मूल २ दो हुआ इसका घन ८ आठ हुआ उसको अपने समान अङ्क ८ आठहीसे गुणा किया तब ६४ चौंसठ हुआ यही फल है ॥ वा राशिः ९ अस्य मूलम् ३ घनः २७ अस्य वर्गों नवानां घनः ७२९ यो वर्गघनः स एव वर्गमूलघन- वर्गः ॥ बीजगणितेऽस्योपयोगः । इति घनः ॥