लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) लीलावती । फैलाव-तथा वर्गराशि ९ नौ है इसका मूल तीन हुआ उसका घन किया तब २७ सत्ताईस हुआ इसको स्वसमान अंक सत्ताईससे ही गुणा किया तब २७ × २७ = ७२९ सातसौ उनतीस हुआ यही नौ ९ का घन है ॥ जो वर्गका घन होता है, वही वर्गमूलका घनवर्ग होता है इससे बीज गणितमें बहुत साहाय्य होता है ॥ इति घनः॥ अथ घनमूले करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- घनमूल करनेके विषयमें २ दो श्लोक. आद्यं घनस्थानमथाघने द्वे पुनस्तथान्त्याद्धनतो विशोध्य ॥ घनं पृथक्स्थं पदमस्य कृत्या त्रिघ्नया तदाऽऽद्यं विभजेत्फलं तु ॥ १४ ॥ पङ्क्त्यां न्यसेत्तत्कृति- मन्त्यनिघ्नीं त्रिघ्नीं त्यजेत्तत्प्रथमात्फलस्य ॥ घनं तदाद्याद्धनमूलमेवं पंक्तिर्भवेदेवमतः पुनश्च ॥ १५ ॥ अन्वयः-आद्यं घनस्थानं स्यात् । अथ द्वे अघने स्याताम् । पुनः तथा अन्त्यात् घनतः घनं विशोध्य पदं पृथक्स्थं कार्य्यम् । अस्य कृत्या त्रिघ्न्या तदाद्यं विभजेत् । फलं तु पंक्त्यां न्यसेत् । तत्कृतिम् अन्त्यनिघ्नीं त्रिघ्नीं तत्प्रथ- मात् त्यजेत् तदाद्यात् फलस्य घनं त्यजेत् । एवम् पंक्तिः भवेत् ! एवम् अतः पुनश्च कार्य्यम् ॥ १४ ॥ १५ ॥ अर्थः-जिस राशिका घनमूल निकाला जाता है उसमें पहला घनस्थान होता है, उसका यह चिह्न ! है फिर दो अघन स्थान होते हैं उनका यह ०० चिह्न है फिर एक घन होता है फिर दो अघन होते हैं इसी प्रकार जहां तक अ हों घन अघन जान लय फिर अन्तके घनसे किसी कल्पित अंकके घनको घटा कर जिस अंकका घन घटाया हो उसको एक स्थानमें अलग लिखे. फिर जिसका घन घटाया है उस अंकका वर्ग करके फिर ३ तीनसे गुणाकर घनसे आदिके अघनमें भाग देय जितने बार घटे उस भागकी लब्धिको पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखे. फिर लब्धिका वर्ग कर फिर अन्तके अंकसे गुणा कर त्रिगुणा करके द्वितीय अघनमें घटा देय. फिर लब्धिका घन अघनके समीपेके घनमें घटा देय यदि अंक शेष रहें तो फिर इसी रीतिसे करे जबतक राशि निःशेष हो ॥ १४ ॥ १५ ॥ अत्र पूर्वोद्देशके उक्तघनानां मूलार्थं न्यासः-७२९ । १९६८३ । १९५३१२५। क्रमेण लब्धानि मूलानि ९ । २७ । १२५ ॥