भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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शून्यपरिकर्मप्रकारः । ( ३९ ) अर्थ:-शून्य जोडमें, जो अन्य राशि हैं उनके समान हो जाता है. शून्यका वर्ग वर्गमूल, घन, घनमूल, करनेसे शून्य ही लब्धि होता है. राशिमें शून्यका भाग देनेसे हरके स्थानमें शून्य ही होता है, शून्यसे गुणा करनेसे शून्य ही लब्धि होता है, यदि गुणा करनेपर कोई भाग अथवा घटाव करना बाकी रह जाय तब शून्यसे गुणित राशिको चिन्तना करे अर्थात् वैसे ही लिखी रक्खै क्योंकि शून्य० गुणा करने पर यदि शून्यका भाग देना होता है तब राशि जैसाका तैसा ही रहता है. क्योंकि गुणक और भाजक सम हैं अर्थात् जिस अंकसे गुणा किया जाय यदि उसी अंकका भाग दो तो राशि यथास्थित रहता है. तिसी तरहसे शून्यसे योग करी हुई राशि और शून्यसे घटाई हुई राशि अविकृत रहती है ॥ ६ ॥ ७ ॥ अत्रोद्देशकः- शून्यके योग वर्ग इत्यादि करनेका उदाहरण- खं पंचयुग्भवति किं वद खस्य वर्गं मूलं घनं घनपदं खगुणाश्च पञ्च ॥ खेनोद्धृता दश च कः खगुणो निजार्द्धयुक्तस्त्रिभिश्च गुणितः खहृतस्त्रिषष्टिः ॥ ९ ॥ अन्वयः-हे सखे ! पंचयुक् खं किं भवति तथा खस्य वर्गम् वर्गमूलं घनं घनपदं च किं भवति खगुणाः पञ्च खेनोद्धृताः दश च ( पुनः ) कः ( राशिः ) खगुणः निजार्द्धयुक्तः त्रिभिः गुणितः खहृतः त्रिषष्टिः । इति त्वं वद ॥ ९ ॥ अर्थः-हे मित्र ! पांच करके युक्त शून्य क्या होता है और शून्यका वर्ग तथा वर्गमूल और घन तथा घनमूल क्या होता है ? शून्यसे गुणा किये हुए पांच कितने होते हैं और दशमें शून्यका भाग देनेसे क्या लब्धि होता है और शून्य से गुणा किया तब जो अंक हुआ उसका आधा उसमें और जोड दिया फिर तीन ३ स गुणा करके शून्यका भाग दिया तब ६३ तिरसठ होता है तो कहो मूल राशि क्या है ? ॥ ९ ॥ न्यासः-० । एतत्पञ्चयुतं जातम् ५ खस्य वर्गः । ० । मूलम् । ० । घनम् । ० । घनमूलम् । ० । न्यासः । ५ । एते खेन गुणिता जाताः । ० । न्यासः । १० । एते खभक्ताः १०/० अज्ञातो राशिस्तस्य गुणः । ० । स्वार्द्धक्षेपः १/२ गुणः ३ हरः । ० । दृश्यम् ६३ ततो वक्ष्यमाणे विलोमविधिना इष्टकर्मणा वा लब्धो राशिः १४ अस्य गणितस्य ग्रहगणिते महानुपयोगः ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri