लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदृष्टजातिप्रकारः। ( ४५ ) हर अंशोंको गुणा किया तब $\frac{१}{६}\ \frac{१}{३}\ \frac{१}{२}\ \frac{१}{६} = \frac{१}{७}\ \frac{२}{३}\ \frac{१}{६}\ \frac{१}{२८} = \frac{८}{६}\ ६$ $\frac{९}{६}\ \frac{१८}{२४} = \frac{२४}{२४}\ \frac{७४}{२४}\ \frac{३६}{२४}\ \frac{१७}{२४}$ ऐसा रूप हुआ, इनके अंशोंको जोडा तब $\frac{१७२}{२४}$ ऐसा रूप हुआ, यहाँ छ ६ का परिवर्तन दिया तब $\frac{१७}{४}$ ऐसा रूप हुआ, फिर इष्ट ३ तीनसे दृष्ट ६८ अडसठको गुणा किया तब २०४ दोसौ चार हुए, इसमें पहली राशि $\frac{१७}{४}$ का भाग दिया अर्थात् $\frac{१७}{४}\ \frac{२०४}{१}$ यहां भाजकके हर अंशका परस्पर परिवर्तन किया $\frac{४}{१७}\ \frac{२०४}{१}$ अब अंशके अंशसे और हरको हरसे गुणा किया तब $\frac{८१६}{१७}$ ऐसा रूप हुआ यहां अंशमें हरका भाग दिया तब ४८ अडतालीस लब्धि हुआ, यही ४८ वह राशि है कि, जिसमें पूर्वोक्त गणितक्रिया करनेसे ६८ अडसठ होता है क्योंकि जब ४८ अडतालीसको पांचसे गुणा किया तब २४० दोसौ चालीस हुए, इसमें अपना तृतीयांश ८० अस्सी घटाया तब १६० एकसौ साठ शेष रहा, इसमें दश- १० का भाग दिया तब १६ सोलह लब्धि हुए, इसमें अपना अर्थात् ४८ अडता- लसिका तृतीयांश १६ सोलह और आधा २४ और चतुर्थांश १२ जोडा तब वही १६ अडसठ ६८ होता है, इसी प्रकार सर्वत्र उदाहरणोंमें जो फल होता है वही १६ अभीष्ट राशि होती है ॥ २४ १२ ६८ अपरोदाहरणम्- दूसरा उदाहरण-इसमें एक हाथी और तीन ३ हस्तिनी यह ४ चार राशि दृष्ट है इस कारण इसको दृष्टजाति उदाहरण कहते हैं- यूथार्द्धं सत्रिभागं वनविवरगतं कुञ्जराणाञ्च दृष्टं षड्भागश्चैव नद्यां पिबति च सलिलं सप्तमांशेन मिश्रः ॥ पद्मिन्यां चाष्टमांशः स्वनवमसहितः क्रीडते सानुरागो नागेन्द्रो हस्तिनीभिस्तिसृभिरनुगतः का भवेद्यूथ- संख्या ॥ १ ॥ क्षेपकमिदम् ॥ अन्वयः-कुञ्जराणां सत्रिभागं यूथार्द्धं वनविवरगतं दृष्टम् । षड्भागः सप्तमांशेन मिश्रः च नद्यां सलिलं पिबति । एवं तथा स्वनवमसहितः अष्टमांशः च पद्मिन्यां सलिलं पिबति । तथा तिसृभिः हस्तिनीभिः अनुगतः नागेन्द्रः सानुरागः क्रीडते । तर्हि यूथसंख्या का भवेत् ? ॥ १ ॥