लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्लेषजातिप्रकारः। (५१) अर्थः-हे मित्र ! किसी पुरुषने अपनी प्रियाको मणियोंका आभूषण बनाकर दिया. उस कमलवत नेत्रवाली कामिनीने उस आभूषणमेंसे आठवें १/८ भागसे बने हुएको तो मस्तकमें पहरा और जो शेष बचा उसके तिगुने सातवें भागसे ३/७ बने हुए को स्तनोंके मध्यभागमें मालाके स्थानमें श्रृङ्गार किया तब जो शेष बचा उसके आधे १/२ से बने हुएको बाजूवन्दके स्थानमें शृंगार किया. फिरभी जो बच रहा उसके तिगुने चौथे भाग ३/४ से बने हुए को कमरमें श्रृङ्गार किया तब भी सोलह १६ मणिका आभूषण बचा. उससे वेणीमें श्रृङ्गार किया तो कहो कि, वे कितने मणियोंसे जटित आभूषण थे ॥ १ ॥ न्यासः- १/८ ३/७ १/२ ३/४ दृश्यम् १६ यथोक्तकरणेन जातो मणिराशिः २५६ यद्वापूर्ववदिष्ट कर्म्मणा विलोमादिना प्रभागजात्या च जातो मणिराशिः २५६ ॥ इदं क्षेपकम् ॥ फैलाव-ऊपर कहे हुए नियमके अनुसार सब हरोंको परस्पर गुणा किया तब ४४८ चारसौ अडतालीस हुए. फिर अपने २ अंशको अपने २ हरमें घटाया तब ७, ४, १, १, ऐसा रूप हुआ. इनको परस्पर गुणा किया तब २८ अट्ठाईस हुए. इसमें पहले हरोंके गुणनफल ४४८ का भाग दिया (भाजक) ४४८ (भाज्य) २८ २८/४४८ यहां २८ से अपवर्तन किया तब १/१६ ऐसा रूप हुआ. इसका दृश्यराशि १६ में भाग लिया १/१६ १६/१ = १६*१६ = २५६ तब दोसौ छप्पन फल हुआ. अथवा पूर्व कही हुई इष्ट कर्म्मकी रीति के तथा विलोमकी रीति के और प्रभागजातिकी रीति के करनेसे भी २५६ वही फल होता है ॥ अथ विश्लेषजात्युदाहरणम्-अब अन्तर करनेके विषयकी जातिका उदा हरण लिखते हैं। पञ्चांशोऽलिकुलात्कदंबमगमत्त्र्यंशं शिलीन्ध्रं तयो- र्विश्लेषस्त्रिगुणो मृगाक्षि कुटजं डोलायमानोऽपरः ॥ कान्ते केतकमालतीपरिमलप्राप्त्यैककालप्रियादूताहूत इतस्ततो भ्रमति खे भृङ्गोऽलिसंख्यां वद ॥ ४ ॥ अन्वयः-हे मृगाक्षि ! अलिकुलात् पञ्चांशः कदम्बम् अगमत् । त्र्यंशं शिलीन्ध्रम अगमत् । तयोः विश्लेषः त्रिगुणः कुटजम् अगमत् । हे कान्ते ! केतकमालतीपरि- मलप्राप्त्यैककालप्रियादूताहूतः अपरः भृङ्गः दोलायमानः सन् खे इतस्ततः भ्रमति । तर्हि अलिसंख्यां वद ॥ ४ ॥