भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( ५२ ) लीलावती । अर्थः-हे प्रिये ! भ्रमरोंका एक समूह था. उसमेंसे पांचवां भाग १/५ तो कदम्ब- पर चला गया और तीसरा भाग १/३ शिलीन्ध्रपर चला गया और उन दोनों भागोंका जो अन्तर करनेसे शेष रहता है वह भाग त्रिगुणित कुट- जपर चला गया. हे हरिणीके समान नेत्रोंवाली प्रिये ! केतकी और मालतीके सुगन्धको एकही समय प्राप्त हुआ जो वायु वही प्रियाका दूत उसकरके बुलाया हुआ एक भ्रमर दोलायमान होकर आकाशमें इधर उधर घूमता है तो कहो वह कितने भ्रमर थे ? [ एक तरफ केतकीका वृक्ष था और एक तरफ मालतीका वृक्ष था और दोनोंके गन्धसे सुगंधित वायु एक ही समय चलता था. जब इधरका वायु चले तो इधरके सुगंधिसे भ्रमर इधर आता था और उधरका सुगंधि आता था तब उधरको जाताथा मानो इसकी दो स्त्री हैं. एक कालमें दोनोंका दूत बुलानेको आया है सो झूलेकी तरह कभी इधर जाता है कभी उधर जाता है. ] न्यासः- १/५ १/३ २/५ दृश्यम् १ । जातमलिकुलमानम् १५ एवमन्यत्राऽपि ॥ इतीष्टकर्म. फैलाव-यहां पहले भिन्न व्यवकलनकी रीतिके अनुसार १/५ १/३ इनका अन्तर किया अर्थात् समच्छेद किया तब ३/१५ ५/१५ ऐसा रूप हुआ. अंश ५ पांचमें अंश ३ तीनको घटाया तब २/१५ ऐसा रूप हुआ. इसे त्रिगुणा किया तब ६/१५ ऐसा रूप हुआ. तीनसे परिवर्तन दिया तब त्रिगुणित अन्तर २/५ हुआ. अब १/५ १/३ २/५ इनका सम- च्छेद किया तब १/५ ५/२५ १०/५० = ३/१५ ५/२५ ३०/७५ = ७०/७५ २५/७५ ३०/७५ ऐसा रूप हुआ फिर योग किया तब ७०/७५ ऐसा हुआ इसमें ५ पाँचका अपवर्तन दिया तब १४/१५ ऐसा- रूप हुआ. इसको इष्ट १ एकमें घटाया तब १/१ - १४/१५ = १५/१५ - १४/१५ = १/१५ ऐसा रूप हुआ. इसका इष्ट १ एकसे गुणा किये हुए दृश्य १ एकमें भाग लिया १/१ / १/१५ = १५/१ / १/१ = १५/१ तब पन्द्रह १५ लब्धि हुए. यही भ्रमरोंका समूह था ॥ आलाप-पाँचवाँ भाग ३ तीन तो कदम्बपर और तीसरा भाग ५ पाँच शिलीन्ध्रपर इनका अन्तर जो हुआ सो, सो त्रिगुणित अर्थात् ६ छ भ्रमर कुटजपर और १ एक इधर उधर घूमता था. सबको जोडा तब वही १५ पन्द्रह हुआ ॥ इति इष्टकर्म ॥ संक्रमणे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- संक्रमण करनेकी रीति आधे श्लोकमें कहते हैं- योगोऽन्तरेणोनयुतोऽर्द्धितस्तौ राशी स्मृतौ संक्रमणाख्यमेतत् ॥

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