भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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वर्गकर्मप्रकारः । ( ५३ )

अन्वयः-योगः ( एकदा ) अन्तरेण ऊनः । ( एकदा ) अन्तरेण युतः अर्द्धितः च अन्तरेण ऊनयुतः अर्द्धितः । तौ राशी स्मृतौ । एतत् संक्रमणाख्यं भवति ॥ अर्थः-प्रश्नकर्त्ता जो योगकी संख्या कहे उसमें उसीकी कही हुई अन्तरकी संख्या एकबार घटा दे जो शेष रहे उसका आधा कर ले तब एक राशि निकलती है फिर उसी प्रश्नकर्ताके कहेहुए योगमें उसीके कहेहुए अन्तरको जोडकर जो राशि हो उसको आधा करनेसे जो अंक हो वह दूसरी राशि होती है. इस प्रकार दोनों राशि निकलती है. इसीको संक्रमणनामसे कहते हैं ॥ अत्रोद्देशकः- संक्रमणके विषयमें उदाहरण- ययोर्योगः शतं सैकं वियोगः पञ्चविंशतिः ॥ तौ राशी वद मे वत्स वेत्सि संक्रमणं यदि ॥ १ ॥ अन्वयः-हे वत्स ! ययोः योगः सैकं शतम् । वियोगः पञ्चविंशतिः । तौ राशी यदि संक्रमणं वेत्सि तर्हि मे वद् ॥ १ अर्थः-जिन दो राशियोंका जोड १०१ एकसौ एक है और घटाव २५ पचीस है यदि संक्रमण जानते हो तो कहो. वह दोनों राशि कौन हैं ? ॥ १ ॥ न्यासः-योगः १०१ अन्तरम् २५ । जातौ राशी ३८ । ६३ ॥ फैलाव- उपरोक्त नियमानुसार योगकी संख्या १०१ एकसौ एकमें पहले २५ पचीसको घटाया तब छियत्तर ७६ हुए. इनका आधा किया तब ३८ अडतीस हुए. यह १ एक राशि हुआ. फिर योग १०१ में अन्तर २५ को जोडा तब १२६ एकसौ छब्बीस हुआ. इनको आधा किया तब ६३ तिरसठ हुआ. यह दूसरा राशि हुआ ३८ । ६३। यही वह दोनों राशि हैं कि, जिनके जोडनेसे १०१ एकसौ एक होता है और घटानेसे २५ पचीस होता है क्योंकि ३८ । ६३ को जोडा तब १०१ एकसौ एक हुआ ६३ तिरसठमें अडतीस ३८ घटाया तब २५ शेष रहा ॥ इति संक्रमणम् । अन्यत्करणसूत्रं वृत्ताद्धम् । राशियोंका वर्गान्तर और राशियोंका अन्तर जानकर राशियोंके जाननेकी रीति आधे श्लोकमें कहते हैं:- वर्गान्तरं राशिवियोगभक्तं योगस्ततः प्रोक्तवदेव राशी ॥ ११ ॥ अन्वयः-वर्गान्तरं राशिवियोगभक्तं योगः स्यात् । ततः प्रोक्तवत् एव राशी ज्ञेयौ ॥ ११ ॥