लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(५६) लीलावती। एवमेकेनेष्टेन जातौ राशी ७/२ ५७/८ द्विकेन ३१/४ ९९३/३२ अथ द्वितीयप्रकारेणेष्टम् १ अनेन द्विगुणेन रूपं भक्तम् १/२ इष्टेन सहितं जातः प्रथमो राशिः ३/२ द्वितीयो रूपम् १ एवं राशी ३/२ १ एवं द्विकेन ९/४ २ त्रिकेन १९/६ ३ त्र्यंशेन जातौ राशी ११/६ १/३ ॥ फैलाव-उपरोक्त नियमानुसार प्रथम राशि लानेके वास्ते इष्टकल्पना किया १/२ आधेको इसका वर्ग किया तब १/४ ऐसा रूप हुआ. इसको ८ आठसे गुणा किया अर्थात् १/४ १ = ३२/४ १ ऐसा रूप समच्छेद करनेसे हुआ तब भिन्न गुणनकी रीति के अनुसार अंशको अंशसे और हरको हरसे गुणा किया तब ३२/१६ ऐसा रूप हुआ. अब अंशमें हरका भाग दिया तब २ दो लब्धि हुए. यही गुणनफल है. इसमें १ एक घटाया तब १ एक शेष रहा. उसका आधा किया तब १/२ ऐसा रूप हुआ इष्ट १/२ का भाग दिया अर्थात् १/२ १/२ - १/२ १/२ - १/२ २/१ = ४/४ ऐसा रूप हुआ. अंशमें हरका भाग दिया तब १ एक लब्धि हुआ. यही पहली राशि है ॥ इसी प्रथम राशि १ का वर्ग किया तब १ एक हुआ. इसका आधा किया तब १/२ ऐसा हुआ. इसे एक भागानुबन्धकी रीतिस जोडा तब ३/२ यह दूसरा राशि हुआ. अर्थात् १ ३/२ यही वह दोनों राशिमें हैं जिनके वर्गान्तर अथवा वर्गयोगमें एक १ घटा- नेसे वर्गराशि वर्गमूल लेनेके योग्य हो जाता है. क्योंकि १ ३/२ इन दोनों राशियोंका वर्ग १ ९/४ कर योग करनेसे १ ९/४ = ४/४ ९/४ = १३/४ ऐसा रूप होता है. इसमें एक १ घटा देनेसे दूसरा राशि ३/२ वर्गमूल मिल जाता है. और १ १३/४ का अन्तर १ ९/४ = ४/४ ९/४ = ५/४ ऐसा होता है. यहाँ एक घटानेसे ४/४ पहली १ राशि मूल मिलता है ॥ और जब १ एक को इष्ट माना तो इष्ट १ एकका वर्ग कर आठसे गुणा किया तब आठ ८ हुआ. इसमें १ घटाया तब ७ सात रहा. इसका आधा किया तब ७/२ ऐसा रूप हुआ. इसमें इष्ट १ का भाग दिया तब प्रथमराशि ७/२ यह हुई ॥ इसी प्रथमराशिका वर्ग किया तब ४९/४ ऐसा हुआ. इसका आधा किया तब ४९/८ ऐसा रूप हुआ. इसमें भागानुबन्धकी रीतिसे १ एक जोड दिया तब ५७/८ ऐसा रूप हुआ, अर्थात् ७/२ ५७/८ यही वह दोनों राशि हैं कि, जिनके वर्गान्तर और वर्गयोगमें एक घटानेसे राशिवर्गमूल मिल जाता है. क्योंकि, इनका वर्ग ४९/४ ३२४९/६४ कर योग