लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवर्गकर्मप्रकारः । (५५) अर्थः-अपनी इच्छाके अनुसार कोई इष्ट मानकर उसका वर्ग करनेसे जो राशि हो उसको ८ आठसे गुणा करके एक १ घटा दे. फिर जो राशि रहे उसको आधा करे. फिर उस आधेमें इष्टका भाग दे तब जो अङ्क लब्धि हों वह पहली राशि होती है. फिर इस राशिका वर्ग करके आधा कर ले और एक मिला दे तब दूसरी राशि होती है ॥ १२ ॥ रूपं द्विगुणेष्टहतं सेष्टं प्रथमोऽथवाऽपरो रूपम् ॥ कृतियुतिवियुती व्येके वर्गौ स्यातां ययो राश्योः ॥ १३ ॥ अन्वयः-रूपं द्विगुणेष्टहृतं सेष्टं प्रथमः राशिः स्यात् । अथवा रूपम् अपरः राशिः स्यात् । ययोः राश्योः कृतियुतिवियुती व्येके वर्गौ स्याताम् ॥ १३ ॥ अर्थः-रूप अर्थात् एकको द्विगुणित कल्पना किये हुए इष्टसे भाग लेय. जो लब्धि आवे उसमें इष्टको जोड दे तब प्रथम राशि होती है और दूसरा राशि रूप अर्थात् एक ही होता है. जिन राशियोंका वर्गयोग और वर्गान्तर एक घटानेसे वर्ग हो जाता है ॥ १३ ॥ उद्देशकः-उदाहरण- राश्योर्ययोः कृतिवियोगयुती निरके मूलप्रदे प्रवद तौ मम मित्र यत्र॥क्लिश्यन्ति बीजगणिते पटवोऽपि मूढाः षोढोक्त- गूढगणितं परिभावयन्तः ॥ १ ॥ अन्वयः-हे मित्र ! ययोः राश्योः कृतिकियोगयुती निरेके मूलप्रदे भवतः तौ राशी मम प्रवद् । यत्र बीजगणिते षोढोक्तगूढगणितं परिभावयन्तः पटवः अपि मूढाः इव क्लिश्यन्ति ॥ १ ॥ अर्थः-हे प्रियवर ! जिन राशियोंका वर्गान्तर और वर्गयोग एक घटानेसे वर्गमूल लेनेके योग्य हो जाता है उन दोनों राशियोंसे हमसे कहो. जिन राशियोंके बतानेमें बीजगणितमें छ प्रकारके अव्यक्त गणितको परिशीलन करनेसे बुद्धिशाली भी मूर्खोंकी तरह क्लेश पाते हैं ॥ १ ॥ न्यासः-अत्र प्रथमानयने कल्पितमिष्टम् अस्य १/२ कृतिः -अष्टगुणो जातः २ अयं व्येकः १ दलितः १/२ इष्टेन १/२ हृतो जातः १ अस्य कृतिः १ दलिता १/२ सैका ३/२ अयमपरो राशिः एवमेतौ राशी १ ३/२ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri