लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुणकर्मप्रकारः । ( ६१ ) न्यासः-मूलगुणम् ७/२ दृष्टस्यास्य २ गुणार्द्धकृत्या ४९/१६ युक्तस्य मूलम् ९/४ गुणाद्धेन ७/४ युतम् १६/४ वर्गीकृतम् जातं हंसकुलमानम् १६ ॥ फैलाव-उपरोक्त नियमानुसार मूलगुण ७/२ का आधा किया तब ७/४ ऐसा रूप हुआ. इसका वर्ग किया तब ४९/१६ ऐसा हुआ. इसको दृष्ट राशि दो २ में जोडा तब ४९/१६ + २/१ = ४९/१६ + ३२/१६ = ८१/१६ ऐसा रूप हुआ. इसका मूल लिया तब ९/४ ऐसा रूप हुआ. इसमें मूलगुण ७/२ का आधा ७/४ को जोडा ९/४ + ७/४ तब यहाँ समच्छेद है इसलिये १६/४ ऐसा रूप हुआ. वर्ग किया तब २५६/१६ ऐसा हुआ. तब अंशमें हरका भाग देकर राशिको शोधा तो सोलह १६ लब्धि हुआ. यही हंसोंके कुलका प्रमाण है॥ अथ मूलयुते दृष्टे चोदाहरणम्- अब गुणमूलयुत दृष्ट राशिका उदाहरण दिखाते हैं- स्वपदैर्नवभिर्युक्तं स्याच्चत्वारिंशताधिकम् ॥ शतद्वादशकं विद्वन्कः स राशिर्निगद्यताम् ॥ २ ॥ अन्वयः-हे विद्वन ! यः नवभिः स्वपदैः युक्तं चत्वारिंशताधिकं शतद्वादशकं स्यात् सः राशिः कः इति निगद्यताम् ॥ २ ॥ अर्थः-हे विद्वन्! जो राशि अपने नौ चरणों करके युक्त बारहसौ चालीस १२४० है वह राशि कौन होगा सो कहो ॥ २ ॥ न्यासः-मूलगुणम् ९ दृश्यम् १२४० गुणार्द्ध ९/२ मस्य कृत्या ८१/४ युक्तं जातम् ५०४१/४ अस्य मूलम् ७१/२ गुणाद्धेन ९/२ अत्र विहीनम् ६२/२ वर्गीकृतम् ३८४४/४ छेदेन हृते जातो राशिः ९६१ ॥ फैलाव- पूर्वोक्त सूत्रानुसार मूलगुण ९ नौका आधा ९/२ का वर्ग किया तब ८१/४ ऐसा रूप हुआ. इसको दृष्ट १२४० बारहसौ चालीसमें जोडा तब ८१/४ + १२४०/१ = ८१/४ + ४९६०/४ = ५०४१/४ ऐसा रूप हुआ. इसका वर्गमूल लिया तब ७१/२ ऐसा रूप हुआ. इसको गुणार्द्ध ९/२ से हीन ७१/२ - ९/२ किया तब ६२/२ ऐसा हुआ. ( यहाँ हीन इस कारण किया है कि, मूलगुणयुक्त करना कहा है. ) फिर इस निष्पन्न राशिका वर्ग किया तब ३८४४/४ ऐसा रूप हुआ फिर अंशमें हरका भाग दिया तब ९६१ यह निष्पन्न राशि हुआ. यही अपने नव पादोंसे युक्त १२४० होता है ॥