लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यस्तत्रैराशिकप्रकारः । ( ६९ ) अपवर्तन दिया तब ४७२/६४ ऐसा होनेपर अंशमें हरका भाग लेनेसे ७ सात द्रोण लब्धि हुए और २४ द्रोण बचे, उनके "स्यादाढको द्रोणचतुर्थभागः" चारसे गुणा करके आढक किये तो ९६ छियानवे हुए. इसमें ६४ का भाग दिया तब एक १ आढक लब्धि हुआ और ३२ बत्तीस आढक बचे. इनके "प्रस्थश्चतुर्थांश इहाढ- कस्य" ४ चारसे गुणा करके प्रस्थ १२८ किया और ६४ चौंसठका भाग दिया तब २ दो प्रस्थ लब्धि हुए और निःशेष हो गया, इस प्रकार ७० सत्तरपणका शालित- ण्डुल २ दो खारी ७ सात द्रोण १ एक आढक २ दो प्रस्थ आवेगा ॥ इति त्रैराशिकम्. अथ व्यस्तत्रैराशिकम्- अब व्यस्त त्रैराशिक लिखते हैं- इच्छावृद्धौ फले ह्रासो ह्रासे वृद्धिः फलस्य तु ॥ व्यस्तं त्रैराशिकं तत्र ज्ञेयं गणितकोविदैः ॥ १८ ॥ अन्वयः-यत्र इच्छावृद्धौ फले ह्रासः स्यात् इच्छाहासे तु फलस्य वृद्धिः स्यात् तत्र गणितकोविदैः व्यस्तं त्रैराशिकं ज्ञेयम् ॥ १८ ॥ अर्थः-जहां इच्छाके बढनेसे फलन्यून हो और इच्छाके न्यून होनेसे फल अधिक हो, तहां गणित प्रवीण पुरुषोंको व्यस्त त्रैराशिक जानना चाहिये ॥ तद्यथा-जहां जहां व्यस्त त्रैराशिक होता है सो स्थल दिखाते हैं:- जीवानां वयसो मौल्ये तौल्ये वर्णस्य हेमनि ॥ भागहारे च राशीनां व्यस्तं त्रैराशिकं भवेत् ॥ १ ॥ अन्वयः-जीवानां वयसः मौल्ये हेमनि वर्णस्य तौल्ये राशीनां भागहारे च व्यस्तं त्रैराशिकं भवेत् ॥ १ ॥ अर्थः-बहुधा जीवोंकी अवस्थाके मोलमें और जाज्वल्यमान सुवर्णकी तोलमें और राशियोंके भाग लेनेमें भी व्यस्त त्रैराशिक होता है ॥ १ ॥ उदाहरणम्- प्राप्नोति चेत्षोडशवत्सरा स्त्री द्वात्रिंशतं विंशतिवत्सरा किम्॥ द्विधूर्वहो निष्कचतुष्कमुक्षा प्राप्नोति धूःषट्कवहस्तदा किम् ॥ अन्वयः-चेत् षोडशवत्सरा स्त्री द्वात्रिंशतं प्राप्नोति तदा विंशतिवत्सरा किं प्राप्नोति । यदि द्विधूर्वहः उक्षा निष्कचतुष्कं प्राप्नोति तदा धूःषट्कवहः किं प्राप्नोति ॥ १ ॥ अर्थः-यदि सोलहवर्षकी स्त्रीको ३२ बत्तीस रुपये मिलते हैं तो २० बीस वर्षकी स्त्रीको क्या मिलेगा ? यदि दूसरे जुअडमें जुडनेवाले बैलको चार ४ निष्क मिलता है तो छठे जुअडमें जुडनेवाले बैलको क्या मिलेगा ? ॥ १ ॥