लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७० ) । लीलावती । न्यासः- १६ । ३२ । २० लब्धम् २५ ३/५ द्वितीयन्यासः-२ । ४ । ६ लब्धम् १ १/३ फैलाव-यह दोनों प्रश्न जीवके मोलके विषयके हैं, इस कारण यह व्यस्त त्रैराशिकका स्थल है, अतएव उपरोक्त नियमानुसार इच्छा २० के बढनेसे फल न्यून ही होगा तो यहां त्रैराशिकमें कही हुई रीतिके अनुसार प्रमाण १६ और फल ३२ का घात किया तब ३२ × १६ ऐसा होनेपर गुणन फल ५१२ में इच्छा २० का भाग दिया तब २५ पच्चीस लब्धि हुए और ३/५ तीनके नीचे पांच हर बचा, इस कारण २० बीस वर्षकी स्त्रीकी कीमत २५ ३/५ हुई ॥ द्वितीय उदाहरणमें भी ज्यों ज्यों अगले २ जुअडमें बैलको जोडते जाओगे त्यों त्यों बोरा कम होता जायगा, इस कारण मूल्य भी कम पावेगा इस कारण इच्छाके बढनेसे फल कमती होगा तो यहां भी त्रैराशिकमें कही हुई व्यस्त त्रैराशिककी रीतिके अनुसार प्रमाण २ और फल ४ चारका घात किया तब ८ आठ हुए, इसमें इच्छाकां भाग दिया तो १ एक लब्धि हुआ और १/३ एकके नीचे तीन हर रहा इस कारण छठे जुअडमें जुडनेवालेका मूल १ १/३ यह हुआ ॥ उदाहरणम्- दशवर्णं सुवर्णं चेद्गद्याणकमवाप्यते ॥ निष्केण तिथिवर्णन्तु तदा वद कियन्मितम् ॥ २ ॥ अन्वयः-चेत् दशवर्णसुवर्णं यदि गद्याणकम् अवाप्यते तदा तिथिवर्णं सुवर्णं निष्केण कियन्मितं प्राप्यते ? ॥ २ ॥ एक निष्कका दशके वर्णका सुवर्ण यदि एक गद्याणक मिलता है तो १५ पन्द्रह वर्णका सोना एक निष्कका कितना मिलेगा ? ॥ २ ॥ न्यासः-१० । १ । १५ लब्धम् २/३ फैलाव-यहां दोनों स्थानोंमें एक एक निष्क मोल है इससे पञ्चराशिककी प्राप्ति है, परन्तु दोनों पक्षोंमें तुल्य जो एक एक हैं, उससे निकाल डाला तो तीन राशि रह गई इस कारण त्रैराशिक ही हुआ. यहां सुवर्णकी तोल है, इससे व्यस्तत्रैरा- शिकका विषय है सो यहां पूर्व नियमानुसार विलोम विधि किया अर्थात् प्रमाण १० और फल १ का घात किया तब दश १० ही हुए; इसमें इच्छा १५ का भाग नहीं लग सकता इस कारण गद्याणक १० को "गद्याणकस्तद्वयम्" २ दोसे गुणा करके धरण किये तब २० बीस हुए, इसमें इच्छा १५ का भाग दिया तब