भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पञ्चराशिकादिप्रकारः । ( ७१ ) १ एक धरण लब्धि हुआ और ५ पांच बचे, इसके वल्ल “धरणश्च तेऽष्टौ” करनेके वास्ते ८ आठसे गुणा किया तब ४० चालीस हुए. इसमें इच्छाका भाग दिय तब २ दो वल्ल लब्धि हुए और १० दश बचे. इनकी “वल्लस्त्रिगुंजः” तीन ३ से गुणा करके गुंजा करी तो ३० तीस हुई. इसमें इच्छाका भाग दिया तो २ दो लब्धि हुआ और निःशेष हो गया. इस प्रकार एक निष्कका पन्द्रह वर्ण सुवर्ण १ एक धरण २ दो वल्ल ३ तीन गुंजा आवेगा. राशिभागहरणे उदाहरणम्- धान्यादि राशिके भाग लेनेके विषयमें उदाहरण- सप्ताढकेन मानेन राशौ सस्यस्य मापिते ॥ यदि मानशतं जातं तदा पञ्चाढकेन किम् ॥ ३ ॥ अन्वयः-यदि सप्ताढकेन मानेन सस्यस्य राशौ मापिते सति मानशतं जातं तदा पञ्चाढकेन किं स्यात् ? ॥ ३ ॥ अर्थः-किसी अनाजकी ढेरीको सात आढकके पात्रसे मापा तब सौ मपाने हुए, अब उसी राशिको पांच आढकके पात्रसे मापें तो कितने नपाने होंगे ? ॥ ३ ॥ न्यासः--७ । १०० । ५ । लब्धम् १४० । फैलाव-यहां राशिका भाग लिया है इस कारण व्यस्त त्रैराशिकका विषय होनेसे पूर्वोक्त नियमानुसार विलोम विधि करी अर्थात् प्रमाण ७ और फल १०० का घात किया तब ७०० सातसौ हुए. इसमें इच्छा पांच ५ का भाग लिया तब १४० एकसौ चालीस लब्धि हुआ. यही पांच आढकके पात्रसे मापनेसे नपैनोंकी संख्या होगी. इति समस्तव्यस्तत्रैराशिकम् ॥ अथ पञ्चराशिकादौ करणसूत्रं वृत्तम्- अब पञ्चराशिक, सप्तराशिक, नवराशिक इत्यादिकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- पंचसप्तनवराशिकादिकेऽन्योन्यपक्षनयनं फलच्छिदाम् ॥ संविधाय बहुराशिजे वधे स्वल्पराशिवधभाजिते फलम् ॥ १९ ॥ अन्वयः-पञ्चसप्तनवराशिकादिके फलच्छिदाम् अन्योन्यपक्षनयनं संविधाय बहुरा शिजे वधे स्वल्पराशिवधभाजिते सति फलं स्यात् ॥ १९ ॥