भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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मिश्रव्यवहारः । ( ८३ ) अन्वयः-अथ स्वकालाः प्रमाणैः गुणिताः व्यततिकालाव्रफलोद्धृताः स्वयोगभक्ताश्च ते विमिश्रनिघ्नाः पृथक् प्रयुक्तखण्डानि भवन्ति ॥ २२ ॥ अर्थः-अपने २ प्रमाण धनसे अपने २ प्रमाण कालको गुणाकर उन्होंमें गये हुए अपने अपने कालसे गुणितफलका भाग देकर अलग स्थानमें लिखे और उनके योग को अलग लिखे, फिर बिना योग किये हुए अङ्कोंको मिश्रधनसे अलग २ गुणा करे और पहले जो योग किया है उसका भाग दे जो लब्धि हो वह मिश्र धनके खण्ड हैं जिनका योग सब मिश्रधन है ॥ २२ ॥ उद्देशकः-- उदाहरण- यत्पञ्चकत्रिकचतुष्कशतेन दत्तं खण्डैस्त्रिभिर्गणक निष्क- शतं षडूनम् ॥ मासेषु सप्तदशपंचसु तुल्यमाप्तं खण्डत्र- येऽपि हि फलं वद खण्डसंख्याम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यत् षडूनं निष्कशंतं त्रिभिः खण्डैः पञ्चकत्रिकचतु ष्कशतेन दत्तम् हि सप्तदशपंचसु मासेषु खण्डत्रयेऽपि फलं तुल्यम् आप्तम् तदा खण्डसंख्यां वद ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितप्रवीण ! यदि एक आदमीके पास ९४ चौरानवे निष्क हैं उसने उसके तीन खण्ड करके ब्याज दिये, उसमें एक खंड पाँच निष्क सैकडे पर दिया वह ७ सात महीने रहा और दूसरा खण्ड ३ तीन निष्क सैकडेपर दिया वह दश १० महीने रहा और तीसरा खण्ड ४ चार निष्क सैंकडेके हिसाबसे दिया वह पांच ५ महीने रहा और तीनों खण्डों का ब्याज बराबर ही मिला तो कहो उन तीनों खण्डोंकी क्या संख्या है ? ॥ १ ॥ न्यासः-- १ ७ | १ १० | १ ५ १०० | १०० | १०० ५ | ३ | ४ मिश्रधनम् ९४ लब्धानि यथाक्रमेण खण्डानि २४ । २८ । ४२ । पञ्चराशिककरणेन समकलान्तरम् ८ फैलाव-इस उदाहरणमें ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार प्रमाणधन १०० । १०० । १०० अपने प्रमाण कालसे १ गुणा किया तो १०० । १०० । १०० हुआ इनमें बीते हुए काल ७ । १० । ५ से अपने २ फल ५ । ३ । ४ (ब्याज) को गुणा किया तब