लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८२ ) लीलावती। अन्वयः-पञ्चकेन शतेन अब्दे चेत् सकलांतरं मूलं स्वं सहस्रं भवति तत्र मूलक- लान्तरे पृथक् वद ॥ १ ॥ अर्थः-सौ १०० पर यदि एक महीनेमें ५ पांच ब्याज मिलता है और एक वर्षमें ब्याज सहित मूलधन एक सहस्र १००० होता है तो उस सहस्रमें मूलधन कितना है और ब्याज कितना है यह अलग अलग कहो ॥१॥ न्यासः- १/१००/५ | १२/१००० लब्धे क्रमेण मूलकलान्तरे ६२५। ३७५ अथवेष्टकर्म्मणा कल्पितमिष्टं रूपम् १ उद्देश- कालापवद्दिष्टराशिरित्यादिकरणेन रूपस्य वर्षे कला- न्तरम् ३/५ एतद्युतेन रूपेण ८/५ १००० रूपगुणे भक्ते लब्धम् ६२५ मूलधनम् ॥ एतन्मिश्रात् १००० च्युतं कलान्तरम् ३७५ फैलाव-यहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार प्रमाण १०० सौ को प्रमाण काल १ एकसे गुणा किया तब १०० सौ ही हुए और मिश्रकाल १२ बारहसे फल ५ पांचको गुणा किया तब ६० साठ हुए. इन दोनों राशियोंको एक जगह लिखा १०० । ६० और इन दोनोंके जोड १६० को दूसरी जगह लिखा फिर अलग २ लिखी हुई जो दोनों १०० । ६० राशि हैं उनको अलग २ मिश्रधन १००० से गुणा किया तब १००००० । ६०००० ऐसा रूप हुआ, इन दोनोंमें पहले दोनों राशियोंके जोडका भाग दिया तब एक जगह पहली राशिमें लब्धि हुआ ६२५ छहसौ पचीस यह तो मूलधन हुआ और दूसरी राशिमें भाग दिया तब लब्धि हुआ ३७५ तीनसौ पिछहत्तर. यह ब्याज हुआ ॥ अथवा इष्ट कर्मको रीतिके अनुसार १ एकको इष्ट माना फिर पञ्चराशिकके रीतिसे इष्ट अङ्क एक १ का ब्याज लिया जैसे १/१००/५ | १२/१/३ यहां इष्ट एकका ब्याज मिला ३/५ तीन ३ के नीचे पांच हर प्रश्नमें मूल और ब्याज मिला हुआ है, इस कारण इष्ट १ एकको भी ब्याज ३/५ में जोड दिया तो ८/५ ऐसा रूप हुआ. इसका इष्ट १ से गुणे हुए दृश्य १००० में भाग लिया तो लब्धि मिला मूलधन ६२५ छ सौ पचीस इसको मिश्रधनमें घटाया तब लब्धि हुआ व्याज ३७५ तीनसौ पिछहत्तर ॥ मिश्रान्तरे करणसूत्रम्- और मिश्रगणित करनेकी रीति लिखते हैं- अथ प्रमाणैर्गुणिताः स्वकाला व्यतीतकालघ्नफलोद्धृतास्ते ॥ स्वयोगभक्ताश्च विमिश्रनिघ्नाः प्रयुक्तखण्डानि पृथग्भवन्ति ॥२२॥