भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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मिश्रव्यवहारः । (८१) १६ १ न्यासः--३०० ३० लब्धानि दाडिमानि १६ १० ० फैलाव-प्रश्नकर्ताके कहनेके अनुसार न्यास \begin{matrix} १६ ३०० १० \end{matrix} \begin{matrix} १ ३० ० \end{matrix} ऐसा हुआ, यहां ऊपर कही हुई रीति के अनुसार फल और मूल्यको पलटा तब \begin{matrix} १ ३० १० \end{matrix} \begin{matrix} १६ ३०० ० \end{matrix} ऐसा हुआ. यहां बहुत राशियोंके घात ४८०० में थोडी राशियोंके घात ३०० का भाग दिया तब १६ सोलह लब्धि हुए, यही १६ दाडिमी दश आमके पलटेमें मिलेंगी. इति लीलावत्यां प्रकीर्णकानि। अथ मिश्रकव्यवहारे करणसूत्रं सार्द्धवृत्तम्- अब मिश्रगणित ( मिश्र उसको कहते हैं जिस गणितमें मिली हुई राशि हों की रीति डेढ़ श्लोकमें लिखते हैं- प्रमाणकालेन हतं प्रमाणं विमिश्रकालेन हतम्फलञ्च ॥ २० ॥ स्वयोगभक्ते च पृथक् स्थिते ते मिश्राहते मूलकलान्तरे स्तः ॥ यद्वेष्टकर्म्माख्यविधेस्तु मूलं मिश्राच्च्युतं तच्च कलान्तरं स्यात्२१ अन्वयः-प्रमाणं प्रमाणकालेन हतम् फलं च विमिश्रकालेन हतं कुर्यात् । ते पृथक् स्थिते मिश्राहते स्वयोगभक्ते च मूलकलान्तरे स्तः । यद्वा इष्टकर्म्माख्यविधेः मूलं मिश्रात् च्युतं तत् कलान्तरं च स्यात् ॥ २० ॥ २१ ॥ अर्थः-प्रमाणको प्रमाण कालसे गुणा करे, फलको मिश्र कालसे गुणा करे और दोनों गुणनफलोंको अलग २ दो स्थानोंमें लिखे. एक स्थानमें दोनोंको मिश्रसे गुणा करे. दूसरे स्थानके गुणन फलोंको जोड कर मिश्रधनसे गुणा किये हुए, दोनोंमें भाग ले तब मूलधन और व्याज निकलता है ॥ २० ॥ अथवा इष्टकर्म्मकी रीति के अनुसार मूल निकाले और उसको मिश्रधनमें घटा दे, तब व्याज निकल आवेगा ॥ २१ ॥ उद्देशकः- उदाहरण- पञ्चकेन शतेनाब्दे मूलं स्वं सकलान्तरम् ॥ सहस्रञ्चेत्पृथक्तत्र वद मूलकलान्तरे ॥ १ ॥ ६ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri