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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

( २४२ ) लीलावती। फैलाव-दूसरे उदाहरण ४। ८ । ५ । ५ । ५ । में पहली रीतिसे एक आदि १ । २ । ३ । ४ । ५ पाँच अंकोंका घात १२० हुआ, इस उदाहरणमें तीन स्थान ५ । ५ । ५ तुल्य हैं; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उन तीनों तुल्य अंकोंके अलग भेद लिये तो ६ मिले इनका पहले सब अंकोंसे मिले हुए भेदों १२० में भाग दिया तो २० बीस लब्धि मिले, यही ऊपरके अंकोंके भेद हुए; उन भेदोंकी संख्याओंका योग ११९९९८८ ॥ अनियतांकैरतुल्यैश्च विभेदे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अनियत और अतुल्य अंकोंके भेद जाननेकी रीति आधा श्लोक- स्थानान्तमेकापचितान्तिमांक- घातः समांकैश्च मितिप्रभेदाः ॥५५॥ अन्वयः-स्थानांतम् एकापचितांतिमांकघातः समांकैः मितिप्रभेदाः स्युः ॥ अर्थः-स्थानान्तपर्य्यन्त अन्तके अंकमें एक एक घटा कर रक्खे हुए अङ्कोंका घात करनेसे दिये हुए अंकोंकी सम संख्याके भेद मिलते हैं ॥ उदाहरणम्- स्थानषट्कस्थितैरंकैरन्योन्यं खेन वर्जितैः ॥ कति संख्याविभेदाः स्युर्यदि वेत्सि निगद्यताम् ॥५३॥ अन्वयः-खेन वर्जितैः स्थानषट्कस्थितैः अंकैः अन्योन्यं संख्याविभेदाः कति स्युः यदि वेत्सि तर्हि निगद्यताम् ॥ अर्थः-शून्यको छोड़कर अर्थात् नौ पर्य्यन्त अंकोंके छ स्थानोंमें परस्पर कितने भेद होंगे ? यदि जानते हो तो कहो ॥ अत्रान्तिमांको नव ९ अत्रान्त्योंको यावत्स्थानमेकापचितः ॥ न्यासः-९।८।७।६।५।४एषां घाते जाताः संख्याभेदाः ६०४८० । फैलाव-यहां अन्तिमसंख्या नौ ९ है; इस अन्तिम अंकको छ स्थानपर्य्यन्त एक एक घटा कर लिखा ९ । ८ । ७ । ६ । ५ । ४ इनका ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार घात किया तो संख्याओंके भेद हुए ६०४८०।

गणितपाशव्यवहारः । (२४३) अन्यत्करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- अंकपाशी और रीति २ श्लोक- निरेकमंकैक्यमिदं निरेकस्थानांतमेकापचितं विभक्तम् ॥८०॥ रूपादिभिस्तन्निहतैः समाः स्युः संख्याविभेदा नियतेऽक- योगे ॥ नवान्वितस्थानकसंख्यकाया ऊनेऽकयोगे कथितं तु वेद्यम् ॥ ८१ ॥ संक्षिप्तमुक्तं पृथुताभयेनानान्तोऽस्ति यस्माद्गणितार्णवस्य ॥ऽऽ॥ अन्वयः-अङ्कैक्यं निरेकं कार्यम् इदं निरेकस्थानान्तम् एका पचितं लेख्यम् । ततः रूपादिभिः विभक्तं कार्यम् । तन्निहतैःअंकैः नियते अंकयोगे समाः संख्याविभेदाः स्युः । कथितं तु नवान्वितस्थानसंख्यकाया ऊने अंकयोग वेद्यम् । पृथुताभयेन एतत् संक्षिप्तम् उक्तं यस्मात् गणितार्णवस्य अन्तः न अस्ति ॥'८१ ॥ अर्थः-प्रश्नमें सब स्थानोंके अंकोंका जो योग हो उसमें एक एक घटाता हुआ। जितने स्थानोंमें प्रश्नकर्त्ताने अंक दिये हों; उससे एक स्थान कममें लिखे और उनके नीचे एक आदि अंकोंका हर लगावे, फिर अंशोंका और हरोंका परस्पर घात करके अंशोंके घातमें हरोंका घातका भाग दे जो लब्धि मिले वही दिये हुए नियत अंकोंके भेद होंगे. परन्तु यह रीति वही होगी, जहां नौ और दिये हुए अंकोंके स्थानोंका योग प्रश्नके अंकोंके योगसे बडा होगा.अतिविस्तार होजानेके भयसे यहां संक्षेपसे कहा है क्योंकि, गणितरूपी समुद्रका तो पार ही नहीं है ॥ ८१ ॥ उदाहरणम्- पञ्चस्थानस्थितैरंकैर्यद्ययोगस्त्रयोदश ॥ कतिभेदा भवेत्संख्या यदि वेत्सि निगद्यताम् ॥ अन्वयः-पञ्चस्थानस्थितैः अंकैः यद्यद्योगः त्रयोदश तेषां कतिभेदा संख्या भवेत् यदि वेत्सि तर्हि निगद्यताम् ॥ अर्थः-पांच स्थानोंमें रक्खे हुए जिन जिन अंकोंका योग तेरह होता है, उनके भेदोंकी संख्या कितनी होगी ? यदि जानते हो तो कहो ॥

( २४४ ) लीलावती । अत्राङ्कैक्यं १३ निरेकम् १२ एतन्निरेकस्थानान्तमे- कापचितमेकादिभिश्च भक्तं जातम् १२/१ ११/२ १०/३ ९/४ एषां घातसमा जाताः संख्याभेदाः ४९५ इति श्रीलीलावत्यामंकपाशः समाप्तः । फैलाव-यहां दिये हुए अंकोंका योग १३ है, इसमें ऊपर कही हुई रीतिके अनु- सार एक घटाया तो १२ रहे, इनमें एक एक घटाया तथा ऊपर कहे हुए स्थानोंसे एक कम स्थानमें अर्थात् चारस्थानोंमें रक्खा १२ । ११ । १० । ९-फिर इनके नीचे एक आदि हर लगाये १२/१ ११/२ १०/३ ९/४ इनके अंश और हरोंका घात किया तो ११८८०/२४ हुए यहां अंश ११८८० में हर २४ का भाग दिया तब ४९५ लब्ध हुए; यही ऊपर दिये हुए उन पाँचों स्थानोंके अङ्कोंके भेदोंकी संख्या है. जिनका योग तेरह था. इस रीतिमें जो ऊपर नियम कहा है, वह भी यहाँ है, क्योंकि नौ और स्थानसंख्या ५ का योग १४ हुआ; इससे प्रश्नमें दिये हुए अङ्कोंका योग कम हैं. इति अङ्कपाशः । न गुणो न हरो न कृतिर्न घनः पृष्टस्तथापि दुष्टानाम् ॥ गर्वितगणकबहूनां स्यात्पातोऽवश्यमंकपाशेऽस्मिन् ॥ ८२ ॥ अन्वयः-अस्मिन् अंकपाशे गुणः न हरः न कृतिः न घनः न तथापि दुष्टानां गर्वि- तगणकबहूनां यदा पृष्टः तदा एव अवश्यं पातः स्यात् ॥ ८२ ॥ अर्थः-इस अंकपाशमें गुणा नहीं है, भाग नहीं है, वर्ग नहीं है, घन नहीं है, तो भी इस अंकपाशमें दुष्टात्मा घमण्ड करनेवाले गणकोंका प्रश्न करनेके समय ही अवश्य पात होगा ॥ ८२ ॥ येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिलव्यवहतिः खलु कण्ठसक्ता ॥ लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति वृद्धिम् ॥ ८३ ॥ अन्वयः-इह खलु सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिलव्यवहतिः सरसोक्तिम् उदाहरंती लीलावती येषां कण्ठसक्ता तेषां सुखसम्पत् सदा एव वृद्धिम्उपैति ८३॥ अर्थः-इस संसारमें निश्चयकरके अनेक प्रकारके गुणोंकी रीति वर्गकी रीतिसे शोभायमान स्पष्ट हैं सम्पूर्ण गणितकी रीतियें जिसमें सुन्दर रसयुक्त है उदा- हरण जिसमें ऐसी यह लीलावती ( ग्रन्थ ) जिनके कण्ठस्थ होती है, उनकी सुखसम्पत्ति वृद्धिको प्राप्त होती है; दूसरा अर्थ-इस असार संसारमें निश्चयकरके

ग्रन्थव्यवहारः । ( २४५ ) सुन्दर जाति और चातुर्य्यादिगुणोंके समूहसे शोभायमान अंगवाली सम्पूर्ण व्यव- हारोंको शुद्धरीतिसे करनेवाली सुन्दर रसीले वचनोंको बोलनेवाली “लीलावती” जिनके कंठमें आलिंगन करती है उनको असीम सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ८३ ॥ क्षेपकम् । अष्टौ व्याकरणानि षट् च भिषजां व्याचष्ट ताः संहिताः षट् तर्कांन्गणितानि पंच चतुरो वेदानधीते स्म यः ॥ रत्नानां त्रितयं द्वयं च बुबुधे मीमांसयोरन्तरं सद्ब्रह्मैकमगाधबोधमहिमा सोऽस्याः कविर्भास्करः ॥ १ ॥ इति श्रीभा० वि० सि० शि० लीलावतीसंज्ञः प्रथमः पाट्यध्यायः ॥ इति श्रीभास्कराचार्य्यविरचितसिद्धान्तशिरोमण्यन्तर्गतलीलावतीसंज्ञपाट्यध्यायस्य स्वरूप- प्रकाशिकानाम्नी काशीस्थराजकीयसंस्कृतविद्यालया (कॉलेज) दधीतन्यायादिशा- स्त्रेण रुहेलखण्डान्तर्गतयवनाधिष्ठितरामपुरपुरीवास्तव्येनाद्यश्वो मुरादाबादें कृतवस- तिना गौडवंशावतंसश्रीयुतपण्डितभोलानाथतनयेन पंडितरामस्वरूपशर्म्मणा विरचिता भाषाटीका समाप्तिमगमत् ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ।

जाहिरा । क्रयपुस्तकें (ज्योतिषग्रंथाः) । नाम, की. रु. आ. कररेखासंख्यावली-भाषा छन्दबद्ध सुगम सामुद्रिक है. ०-४ कृषिकौमुदी-कृषिकारों तथा जमीदारोंको अवश्य देखना चाहिये. ... ... ०-१२ कृषिविद्या-दूसरा भाग. ... ... ०-५ कृषिविद्या-तीसरा भाग. ... ... ०-८ केरलीयजातक-भाषाछन्दबद्ध (केरलमतसे ग्रहोंका द्वादश स्थानगतभावफल) ... ... ०-५ ज्योतिषकल्पद्रुम-भाषा । श्रीमहाराज शंभूसिंहजी सुठा- लियाधीशकृत। इस ग्रन्थमें चोरी, रोगउत्पत्ति, भोजन मृत्यु, स्वप्न, विवाह, शकुन और नयागमयात्रा तथा वृद्धि इत्यादि सबही प्रकरण आगये हैं.ज्योतिषियोंको अव- श्य संग्रह करना चाहिये. ... ... २-० ज्योतिषकी लावनी-भावफल सुगम बतलाया है. ... ०--१ मानसप्रश्नदीपिका-तात्कालिक मनचिंतित प्रश्नविद्या. ०-४ मेघमालाभङ्गुली-वर्षादिकाविचार भलीप्रकार लिखागया है ०-६ रमलगुलजार-भाषामें-इसमें-भाग्योदय, सुख-दुःख,द्रव्य- प्राप्ति, मातापिताका अज्ञातद्रव्यप्राप्ति, तथा कन्या- पुत्रादिके अनेक उत्तम १०४१ प्रश्न वर्णित हैं. ... ३-० रमलसारप्रश्नावली-भाषा। इस ग्रन्थमें पांसा तीन दफे फेकके अंक जोड प्रश्न कहनेका प्रकार है .... ०-१॥ रत्नपरीक्षा भाषा-रत्नोंकी परीक्षाका यह छोटासा पुस्तक उत्तम है ... ... ... ०-४ रमलभास्कर-प्रश्नग्रन्थ. ... ... ०-८ रमलमार्त्तण्ड- ... ... ... ०-६

जाहिरात। (२) नाम. की. रु. आ. सिद्धिसागर-(राशिमाला) भाषामें-जन्मलग्नका फलनिर्णय तथा बारह राशिके फल भली भांति लिखेहैं ... ०-२ संवत्सरफलदीपिका-भाषामें. ... ... ... ०-३ अयोध्याजातक-भाषाटीकासमेत. ... ०-४ अर्घप्रकाश-भाषाटीकासमेत। इसमें तेजी-मन्दी वस्तु देखनेका विचार भलीभाँति लिखगयाहै. .... ०-५ आनन्दप्रकाश-भाषाटीकासमेतायह ग्रन्थ ज्योतिषियोंको अतीवउपयोगी है। इसमें रोगकी स्थिति, असाध्यरोग किसप्रकार शान्त होगा तथा रोगमुक्ति, स्नानदानादि कितनेही उत्तम विषय लिखेगयेहैं. ... ... ०-३ आर्यभटीय-(ज्योतिषशास्त्र) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेत १-० कर्णकुतूहल-सटीक तथा उदाहरणसहित । ब्रह्मपक्षीय गणित ग्रन्थ ... ... ०-१२ करणेन्दुशेखर-इसमें रव्यादि ग्रहोंकी सारणी भलीभाँति दीगईहै। तथा सिद्धान्तोक्त सब विषय संक्षेपसे इसमें आगये हैं. ... ... ०-४ कीर्त्तिपञ्चाङ्ग-संवत् १९८१ का पं० महीधरशर्माकृत । हि- मालयादि देशोंमें यही पंचांग प्रचलितहै. ... ०-६ क्रीडाकौशल्य- भाषाटीकासमेत। इसमें-मुहूर्त,प्रश्न,मन्त्र- यन्त्रादि साधन, पांशे, गँजीफे,ताश, दशावल्लरी ज्ञान- पद, श्मशानद्यूत, साक्षिक्रीडा, विधिक्रीडा, इष्टदेवताद- र्शन शतरंजके अनेकप्रकारके विचित्र खेल और बाल- क्रीडा, रासक्रीडा आदिका वर्णन चित्रोंसमेत. ग्लेज कागज ... .... २-०

( ३ ) जाहिरात। नाम. की. रु. आ. ग्रहलाघवसारणी-यह सारणी बहुतही सरल व उत्तम बनी है इससे तिथि, नक्षत्र, योग, ग्रह आदिकी स्पष्टता तथा ग्रहयुद्ध, शुक्रास्त, सूर्य-चन्द्रग्रहण आदिका ज्ञान बहुतही शीघ्र होता है। जो गणित कार्य्य अधिक समय तक बहुत परिश्रम करनेसे सिद्ध होता था वह इससे अल्प परिश्रमसे थोडे ही कालमें होगा। पञ्चांग बनानेवालोंके लिये बहुतही उपयोगी है. ... १-० बृहज्जातकसटीक-भट्टोत्पलीटीकासमेत जिल्द ... ... २-८ बृहज्जातक-महीधरकृतभाषाटीका अत्युत्तम ... ... २-० पत्रीमार्गदीपिकाऔर-वर्षदीपक (वर्षजन्मपत्र बनानेका ) १-४ मुहूर्त्तचिंतामणि-प्रमिताक्षरा रफ् रु० १ ग्लेज ... ... २-० मुहूर्त्तचिंतामणि-पीयूषधारा टीका ... ... ... ३-८ ताजिकनीलकंठी-सटीक तंत्रत्रयात्मक ... ... .... १-८ ताजिकनीलकंठी-तंत्रत्रयात्मक महीधरकृत भाषाटीका अत्युत्तम टैपकी छपी ... ... ... २-० ज्योतिषसार-भाषाटीकासहित ... ... ... १-१२ मुहूर्त्तचिंतामणिभाषाटीका-महीधरकृत ... ... १-८ मानसागरीपद्धति-( जन्मपत्रबनानेमें परमोपयोगी ) ... ०-१४ बालबोधज्योतिष- ... ... ... ... ... ०-२ ग्रहलाघव-सान्वय सोदाहरण भाषाटीकासमेत स्पष्ट उदाहरण गणिताभ्यासियोंको परमोपयोगी ... १-८ जातकसंग्रह ( फलादेशमें परमोपयोगी ) ... १-० पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, “श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम प्रेस-बंबई.

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CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

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