भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ८५ ) नवीन प्रगट भया हो और हेमन्त शिशिर कालमें प्रगट भया हो और दुर्बलता आदि उपद्रवरहित हो ऐसा रक्तपित्त साध्य होता है ॥ दोषभेदसे साध्यासाध्य लक्षण । एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते । त्रिदोषजमसाध्यं स्यान्मन्दाग्नेरतिवेगितम् ॥ १० ॥ व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत् ॥ ११ ॥ एकदोषका रक्तपित्त साध्य है, द्विदोषका याप्य है और तीनों दोषोंका असाध्य है। मन्दाग्नि अतिवेगसे हो, रोगसे क्षीण देहवालेका, बूढ़े मनुष्यका और जिसका आहार थकगया हो ऐसे मनुष्योंका रक्तपित्त असाध्य होता है ॥ रक्तपित्तके उपद्रव । दौर्बल्यं श्वासकासज्वरवमथुमदाः पाण्डुता दाहमूर्च्छा भुक्ते घोरो विदाहस्त्वधृतिरपि सदा हृद्यतुल्या च पीडा । तृष्णा कोष्ठस्य भेदः शिरसि च तपनं पूतिनिष्ठीवनत्वं भक्तद्वेषाविपाकौ विकृतिरपि भवेद्रक्तपित्तोपसर्गाः ॥ १२ ॥ अशक्तता, श्वास, खांसी, ज्वर, वमन, धतूरेके फल खानेसे जैसी अवस्था हो ऐसी अवस्था, शरीरका पीला वर्ण होजाय, मूर्च्छा, अन्न खानेसे अत्यन्त दाह हो, अधीरपना, सर्वकाल हृदयमें विलक्षण पीडा, प्यास, कोष्ठभेद (अर्थात् मल पतला हो), मस्तकमें पीडा, दुर्गन्धयुक्त थूकना, अन्नमें अरुचि, आहारका परिपाक न होना ये रक्तपित्तके उपद्रव हैं और उसी प्रकार उस रक्तपित्तकी विकृति भी होय है सो आगे-“ मांसप्रक्षालनाभम् ” इत्यादि श्लोककरके कहते हैं ॥ असाध्य लक्षण । मांसप्रक्षालनाभं क्वथितमिव च यत्कर्द्दमाम्भोनिभं वा मेदःपूयास्रकल्पं यकृदिव यदि वा पक्वजम्बूफलाभम् । यत्कृष्णं यच्च नीलं भृशमतिकुणपं यत्र चोक्ता विकारा- स्तद्वर्ज्यं रक्तपित्तं सुरपतिधनुषा यच्च तुल्यं विभाति॥१३॥ जो रक्तपित्त मांस धोये हुए जलके समान हो अथवा सडे पानीके समान अथवा कीचके समान अथवा जलके समान; उसी प्रकार मेद, राध, रुधिर इनके समान अथवा कलेजेके टुकडेके समान अथवा पकी जामुनके समान किंवा काले रंगका किंवा नील कहिये पपैया पक्षीके पंखके समान जिसमें मुरदेकीसी बास आवे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA