माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ११४ ) माधवनिदान । चिकना, खट्टा, खारा, चकारसे कडुवा कसेला आदि जानना, ऐसे भोजनसे तथा मात्राधिक और भारी ऐसा अन्न खानेसे अवश्य ही शीघ्र प्यासको प्रगट करे । दृढबल आचार्यने पांचही तृष्णा कही है-वातकी, पित्तकी, क्षयकी, आमकी, उप- सर्गकी । तहां कफकी आमकी तृषाके अन्तर्गत कही है और क्षतजा वातकी तृषाके अन्तर्गत जाननी और अन्नजा भी वातकी तृषाके अन्तर्गत कही है, क्योंकि भोजनसे वातका कोप होता है। शंका-क्यों जी ! सुश्रुतने मद्यके प्रकरणमें मद्यकी तृष्णा कही है फिर माधवाचार्यने सात ही तृष्णा कैसे कही हैं ? उत्तर- दृढबलाचार्यके मतसे मद्यकी तृषाको वातकी तृषाके अन्तर्गत होनेसे माधवा- चार्यने सातही कही हैं ॥ उपसर्गज तृषाके लक्षण । हीनस्वरः प्रताम्यन्दीनाननशुष्कहृदयगलतालुः ॥ ९ ॥ भवति खलु सोपसर्गा तृष्णा सा शोषिणी कष्टा । ज्वरमोहक्षयकासश्वासाद्युपसृष्टदेहानाम् ॥ १० ॥ हीनस्वर, मोह, मनमें ग्लानि होय, मुख दीन होजाय, हृदय गला और तालु सूख जाय यह तृष्णा उपद्रवोंसे होते हैं। यह मनुष्यको सुखाय डाले और व्याधिसे शरीर कृश होनेसे यह कष्टसाध्य होजाती है। वे उपद्रव ये हैं ज्वर, मोह क्षय, खांसी, श्वास, आदिशब्दसे अतिसारादिकोंका ग्रहण है ये रोग जिसके होय उसके तृष्णा कष्टसाध्य जाननी ॥ असाध्य तृषाके लक्षण । सर्वास्त्वतिप्रसक्ता रोगकृशानां वमिप्रसक्तानाम् । घोरोपद्रवयुक्तास्तृष्णा मरणाय विज्ञेयाः ॥ ११ ॥ वातजादि सब प्रकारकी तृष्णा अत्यन्त बढ़ी हुई अथवा रोगसे कृश भया ऐसे पुरुषके जो तृष्णा है सो अथवा छर्दिसे प्रगट भई जो तृष्णा और जो भयंकर उप- द्रवकरके युक्त ऐसी तृष्णा मारनेका कारण होय है ॥ मधुकोशं सुनिर्मथ्य सारमाकृष्य वै मया । व्रजभाषाकृता टीका माधवार्थप्रकाशिका ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां तृष्णारोगनिदानं समाप्तम् ॥
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