भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131

भाषाटीकासमेत । ( ११३ ) नहीं कही, सुश्रुतने चिकित्सा में भेद होनेसे कही है और हारीतने भी सपित्त कफकी तृष्णा मानी केवल कफकी नहीं मानी । इस तृष्णामें निद्रा, भारीपना, मुखमें मिठास ये लक्षण होते हैं । इस तृष्णासे पीडित पुरुष अत्यन्त सूख जाता है ॥ क्षतजतृष्णाके लक्षण । क्षतस्य रुक्शोणितनिर्गमाभ्यां तृष्णा चतुर्थी क्षतजा मता तु ॥ ६ ॥ शस्त्रादिकके लगनेसे घाव होय तब उस पुरुषके पीडा और रुधिरका स्राव होनेसे जो तृष्णा होय यह चौथी क्षतजतृष्णा जाननी ॥ क्षयजतृष्णाके लक्षण । रसक्षयाद्या क्षयसंभवा सा तयाभिभूतस्तु निशादिनेषु । पेपीयतेऽम्भः स सुखं न याति तां सन्निपातादिति केचिदाहुः । रसक्षयोक्तानि च लक्षणानि तस्यामशेषेण भिषग्व्यवस्येत् ॥ ७ ॥ रसक्षयसे जो तृष्णा होय उसमें जो लक्षण होते हैं सो क्षयज तृष्णामें होते हैं, तिससे पीडित पुरुष रात्रिदिन बारम्बार पानी पीवे परन्तु सन्तोष नहीं होय । कोई आचार्य इसको सन्निपातसे प्रगट कहते हैं रसक्षयके जो लक्षण कहे वे सब होते हैं सो वैद्योंको जानने चाहिये । रसक्षय लक्षण सुश्रुतमें कहे हैं सो इस प्रकारका रसक्षय होनेसे हृदयमें पीडा, कंप, शोष, बाधिरता ( बहरापना ) और प्यास होती है ॥ आमजतृष्णाके लक्षण । त्रिदोषलिङ्गामसमुद्भवा तु हृच्छूलनिष्ठीवनसादकर्त्री ॥ ८ ॥ आमज कहिये अजीर्णसे जो तृष्णा होय उसमें तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं सो सुश्रुतमें लिखा भी है और हृदयमें शूल, लारका गिरना, ग्लानि ये सब होते हैं ॥ अन्नजतृष्णाके लक्षण । स्निग्धं तथाम्लं लवणं च भुक्तं गुर्वन्नमेवाशु तृषां करोति । १ तदुक्तं हारीतेन-स्वाद्वम्ललवणाजीर्णैः क्रुद्धः श्लेष्मा सहोष्मणा । प्रपद्याम्बुवहां स्रोतस्तृष्णां संजनयेन्नृणाम् ॥ शिरसो गौरवं तन्द्रा माधुर्यं वदनस्य च । भक्तद्वेषः प्रसेकश्च निद्राधिक्यं तथैव च ॥ लिङ्गैरैतैर्विजानीयात्तृष्णां कफसमुद्भवाम् ॥ २ रसक्षये हृत्पीडा कंपशोषौ बाधि- रता तृष्णा चेति ॥ ३ अजीर्णात्पवनादीनां विभ्रमो बलवान्भवेत् । इति । सततं यः पिबे- त्तोयं न तृप्तिमधिगच्छति । पुनः काङ्क्षति तोयं च तं तृष्णार्दितमादिशेत् ॥ इति ॥