भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 404 में से

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( ११२ ) माधवनिदान । क्रमसे कहता हूं। इनमें पहिली चार तृष्णा सुखसाध्य हैं और बाकीकी तीन कष्ट- साध्य हैं। शंका-क्योंजी ! इस श्लोकमें- “स्रोतःसु” यह बहुवचन क्यों धरा यह विरुद्ध है, क्योंकि, सुश्रुतमें तो जलके बहनेवाली दोही नाडी मानी हैं। उत्तर-उद- कके बहानेवाले दो स्रोतोंकाही अनेक विस्तार होनेसे बहुवचन किया है। यहांपर अन्न, कफ आमको दुष्ट करनेसे तथा दुष्ट रोगोंको सम्बन्ध होनेसे अन्न, आम, कफको दोषत्व ग्रहण है यह गयदासका मत है अथवा दोषके कहनेसे वात, पित्त, कफका ही ग्रहण करना चाहिये ॥ वातकी तृषाके लक्षण । क्षामास्यता मारुतसंभवायां तोदस्तथा शंखशिरःसु चापि । स्रोतोविरोधो विरसं च वक्त्रं शीताभिरद्भिश्च विवृद्धिमेति ॥ ३ ॥ वातकी तृषा (प्यास) से मुख उतर जाय अथवा दीन होय, कनपटी और मस्तक इन ठिकाने नोचनेके समान पीडा होय, रस और जल बहनेवाली नाडि- योंका मार्ग रुक जाय, मुखसे स्वाद जाता रहे और शीतल जलके पीनेसे प्यास बढे, चकारसे निद्राका नाश होय ॥ पित्तकी तृषाके लक्षण । मूर्च्छान्नविद्वेषविलापदाहा रक्तेक्षणत्वं प्रततश्च शोषः । शीताभिनन्दा मुखतिक्तता च पित्तात्मिकायां परिदूयनं च ॥ ४ ॥ पित्तकी तृषामें मूर्च्छा, अन्नमें अरुचि, बडबड, दाह, नेत्रोंमें लाली, अत्यन्त शोष, शीत पदार्थकी इच्छा, मुखमें कटुता और सन्ताप ये लक्षण होते हैं ॥ कफकी तृषाके लक्षण । बाष्पावरोधात्कफसंवृतेऽग्नौ तृष्णाबलासेन भवेत्तथा तु । निद्रा गुरुत्वं मधुरास्यता च तृष्णार्दितः शुष्यति चातिमात्रम् ॥५॥ अपने कारणसे कुपित कफ करके जठराग्नि आच्छादित होय तब अग्निकी गरमी अधोगत जलके बहनेवाली नाडियोंको सुखाय कफकी तृषाको प्रगट करें केवल कफसे तृष्णाका प्रगट होना असंभव है, केवल कफ बढे भयेका द्रवीभूत धर्म पतला होनेसे प्यासकर्तृत्व असंभव है और वातपित्तको तृषा करनेवाले होनेसे होय हैं सो ग्रन्थान्तरमें लिखा भी है इसीसे चरकाचार्यने कफकी तृष्णा १ द्वे उदकवहे इति । २ यदुक्तम्-‘पित्तं सवातं कुपितं नराणाम्’ इत्यादि । चरकेऽप्युक्तम्- ‘नोऽग्नेर्विना सर्पणाद्वा तौ हि शोषणे हेतुः’ इति । सुश्रुतेऽप्युक्तम्–मन्दस्याग्नेयवायव्यौ गुणाब- म्बुवहानि च । स्रोतांसि शोषयेद्यस्मात्ततस्तृष्णा प्रवर्तते ॥