भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158

( १४० ) माधवनिदान । विचेष्टनैः । धातूनां संक्षयाच्चिन्ताशोकरोगातिकर्षणात् ॥२॥ वेगसंधारणादामादभिघातादभोजनात् । मर्मबाधाद्गजोष्ट्राश्व- शीघ्रयानादिसेवनात् ॥ ३ ॥ देहे स्रोतांसि रिक्तानि पूरयित्वा- ऽनिलो बली । करोति विविधान्व्याधीन्सर्वाङ्गैकाङ्गसंश्रयान् ॥४॥ रूखा, शीतल, थोडा और हलका ऐसे अन्न खानेसे, अति मैथुनके करनेसे बहुत जागनेसे, विषम उपचार करनेसे दोष ( कफ पित्त मल मूत्र इत्यादिक ) और रुधिर इनके निकलनेसे अर्थात् वमन विरेचनसे, लंघन अर्थात् अखाडे आदिमें कला खेलनेसे, नदी आदिमें तैरनेसे, बहुत चलनेसे, अतिदण्डकसरत आदि श्रमके करनेसे, अत्यन्त विरुद्धचेष्टा करनेसे, रस रुधिर आदि धातुओंके क्षय होनेसे, चिन्ता शोक और रोगद्वारा कृश होनेसे, मल मूत्रादिकोंके वेग रोकनेसे, आमसे, लकडी आदिकी चोट लगनेसे उपवास ( व्रत ) के करनेसे आदि ले सब मर्मस्थानोंमें लगनेसे, हाथी ऊंट घोडा इत्यादि जल्दी चलनेवाली सवारीपर बैठनेसे, कोपको प्राप्त भई जो बलवान् वायु सो देहमें खाली जो नस उनमें प्राप्त हो सर्वाङ्ग अथवा एक अङ्गमें व्याप्त होनेवाली ऐसी अनेक प्रकारकी वातव्याधि उत्पन्न करे है॥ वातव्याधिके पूर्वरूप व लक्षण । अव्यक्तं लक्षणं तेषां पूर्वरूपमिति स्मृतम् । आत्मरूपं तु तद्व्यक्तमपायो लघुता पुनः ॥ ५ ॥ उस वक्ष्यमाण वातव्याधिके जो अप्रगट लक्षण उसको पूर्वरूप ऐसे कहते हैं ज्वरादिकोंके सदृश विशिष्ट नहीं हैं। और जो रूप प्रगट होय अर्थात् दोषादि भेद करके यथार्थ दीखे उसको उस व्याधिका लक्षण जानना । अपानवायुके चञ्चल होनेसे, स्तम्भ संकोच कम्पादिका कदाचित् अभाव होय है। और शरीरकी लघुता ( वायुकरके धातुशोषण होनेसे) अथवा 'अपायोऽलघुता' कहिये सब वातविकारोंको अपाय कहिये अभाव होय और वातविकारोंका अलघुता कहिये अल्पत्व करके जो स्थिति है सो निःशेष ( बिलकुल ) निवृत्ति नहीं होय किन्तु कुछ न कुछ अंश रहा आवे जैसे बहिरायाम निवृत्ति होनेपर भी रूक्षादिकोंकी निवृत्ति नहीं होती हैं ॥ अब नाना प्रकारकी व्याधि करै है यह जो कह आये हैं उसको कहते हैं— संकोचः पर्वणां स्तम्भो भङ्गोऽस्थां पर्वणामपि । लोमहर्षः प्रलापश्च पाणिपृष्ठशिरोग्रहः ॥ ६ ॥ खांज्यपांगुल्यकुब्जत्वं शोथोऽङ्गानामनिद्रता । गर्भशुक्ररजोजनाशः स्पंदनं गात्रसु- प्तता ॥ ७ ॥ शिरोनासाक्षिजन्रूणां ग्रीवायाश्चपि हुण्डनम् ।