भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । (१३९) मृगीरोगकी पाली । पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः । अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथोत्तरम् ॥ ८ ॥ कोपको प्राप्त भये जो दोष सो पंद्रहवें दिन अथवा बारहवें दिन अथवा महीने भरमें मिरगीरोग प्रकट करें । तिनमें पैत्तिक १५ दिन, वातिक १२ दिन और श्लैष्मिक ३० दिनमें आती है । इस जगह बारहवें दिनके पिछाडी पक्ष कहना ठीक था फिर पहिले पक्ष धरनेका यह प्रयोजन है कि, अधिक कालकरके ही दोष वेग करते हैं यह कहा । “किंचिदथोत्तरम्” इस पदसे यह सूचना करी है कि, जिस जिस दोषका जो जो काल कहा है उससे पहिले भी दोषोंके तारतम्यसे मिरगीरोग होय है ऐसे जानना । शंका-वेग उत्पन्न करके अपस्मारके प्रगट कर्त्ता दोष देहमें सदा रहते हैं, फिर वे सर्वकालमें वेग क्यों नहीं करते, द्वादशादि दिनमें क्यों करते हैं ? इन विषयमें दृष्टांतरूप समाधान कहते हैं- देवे वर्षत्यपि यथा भूमौ बीजानि कानिचित् । शरदि प्रतिरोहन्ति तथा व्याधिसमुच्छ्रयः ॥ ९ ॥ जैसे चातुर्मासमें इन्द्र वर्षे भी है परन्तु कोई जव, गेहूँ, चना आदि बीज शरद् ऋतुमें ही ऊगते हैं तैसेही सर्वरोगके बीजरूप वातादिक दोष कदाचित् किसी अप- स्मारादिक व्याधिविशेष निदानादिकका संगम होनेसे उस रोगको प्रगट करे हैं । अथवा इसका मुख्य प्रयोजन यह है कि, बीजके अंकुर फूटनेमें तेज, वायु, पृथ्वी, जल ये सहायक भी हैं, परन्तु वे सब कालविशेषकी प्रतीक्षा ( इच्छा ) करते हैं । अंकुर आनेको काल ही सहाय चाहिये अर्थात् जिस कालमें जिस बीजको अंकुर आता है वह उसी कालमें आवेगा बीचमें कभी नहीं आनेवाला, यही न्याय चातु- र्थिक ज्वरादिकोंमें भी जानना ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माधुरीभाषाटीकाया- मपस्मारनिदानं समाप्तम् ॥

अथ वातव्याधिनिदानम् ।

वातव्याधिकी सम्प्राप्ति । रूक्षशीताल्पलघ्वन्नव्यवायातिप्रजागरैः । विषमादुपचाराच्च दोषास्रक्स्रावणादपि ॥ १ ॥ लङ्घनप्लवनात्यध्वव्यायामाति-