माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( १८१ ) शुक्रजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । शुक्रे दोषैरुपहते मूत्रमार्गे विधारिते । सशुक्रं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्वस्तिमेहनशूलवान् ॥ ८ ॥ दोषोंके योगसे शुक्र ( वीर्य ) दुष्ट होकर मूत्रमार्गमें गमन करे, तब उस मनुष्यके मूत्राशय और लिङ्ग इनमें शूल होय और मूतते समय मूत्रके सङ्ग वीर्य पतन होय ॥ अश्मरी और शर्करा इनके साम्य और अवान्तरभेद । अश्मरी शर्करा चैव तुल्यसम्भवलक्षणे । विशेषणं शर्करायाः शृणु कीर्त्तयतो मम ॥ ९ ॥ पच्यमानाऽश्मरी पित्ताच्छोष्यमाणा च वायुना । विमुक्तकफसन्धाना क्षरन्ती शर्करा मता ॥ १० ॥ हृत्पीडा वेपथुः शूलं कुक्षावग्निश्च दुर्बलः। तया भवति मूर्च्छा च मूत्रकृच्छ्रं च दारुणम् ॥ ११ ॥ अश्मरी ( पथरी ) और शर्करा इन दोनोंकी संप्राप्ति और लक्षण समान हैं परन्तु इनमें थोडासा भेद है उसको कहता हूं सुनो, पित्तसे पकनेवाली और वायुसे शुष्क होनेवाली ऐसी पथरी कफसंबन्धी न होय, तब मूत्रके मार्गसे रेतके समान झरने लगे, उसको शर्करा कहते हैं । उस शर्करायोगसे हृदयमें पीडा, कम्प, कूखमें शूल, मन्दाग्नि, मूर्च्छा और भयंकर मूत्रकृच्छ्र ये रोग होयें ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां मूत्रकृच्छ्रनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मूत्राघातनिदानम् । जायन्ते कुपितैर्दोषैर्मूत्राघातास्त्रयोदश । प्रायो मूत्रविघाताद्यैर्वातकुण्डलिकादयः ॥ १ ॥ मूत्रके वेग रोकनेसे ( आदिशब्दसे मल शुक्रादि वेग रोकना और रूक्ष भोजन आदि जानना ) कुपित भये दोषोंसे वातकुण्डलिकादि तेरह प्रकारके मूत्रा- घातरोगको करे ॥ वातकुण्डलिकाके लक्षण । रौक्ष्याद्वेगविघाताद्वा वायुर्बस्तौ सवेदनः ।