भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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( १८२ ) माधवनिदान । मूत्रमाविश्य चरति विगुणः कुण्डलीकृतः ॥ २ ॥ मूत्रमल्पमल्पमथवा सरुजं संप्रवर्तते । वातकुण्डलिकां तां तु व्याधिं विद्यात्सुदारुणम् ॥ ३ ॥ रूखे पदार्थ खानेसे अथवा मलमूत्रादिवेगोंके धारण करनेसे कुपित भई जो वायु सो बस्ती ( मूत्राशय ) में प्राप्त हो पीडा करे और मूत्रसे मिलकर मूत्रके वेगको विगुण ( उलटा ) करके वहां आय कुण्डलके आकार ( गोलाकार ) मूत्राशयमें विचरे तब मनुष्य उस वातसे पीडित हो मूत्रको बारंबार थोडा थोडा पीडाके साथ त्याग करे, इस दारुण व्याधिको वातकुण्डलिकारोग कहते हैं ॥ अष्ठीलाके लक्षण । आध्मापयन्बस्तिगुदं रुध्वा वायुश्चलोन्नताम् । कुर्यात्तीव्रातिमष्ठीलां मूत्रमार्गावरोधिनीम् ॥ ४ ॥ बस्ति ( मूत्राशय ) और गुदा इनमें यह वायु अफरा करे तथा बस्ति और गुदाकी वायुको रोककर चञ्चल और उन्नत ( ऊंची ) ऐसी अष्ठीला ( पत्थरकी पिण्डीके सदृश ) को प्रगट करे, यह मूत्रके मार्गको रोकनेवाली और भयंकर पीडा करनेवाली है ॥ वातबस्तिके लक्षण । वेगं विधारयेद्यस्तु मूत्रस्याकुशलो नरः । निरुणद्धि मुखं तस्य बस्तेर्बस्तिगतोऽनिलः ॥ ५ ॥ मूत्रसङ्गो भवेत्तेन बस्तिकुक्षिनिपीडितः । वातबस्तिः स विज्ञेयो व्याधिः कृच्छ्रप्रसाधनः ॥ ६ ॥ जो मनुष्य अड ( जिद्द ) से मूत्रबाधाको रोके उसके बस्ति ( मूत्राशय ) का वायु बस्तिके मुखको बन्द करदे तब उसका मूत्र बंद होजाय और वह वायु बस्तिमें और कूंखमें पीडा करे, उस व्याधिको वातबस्ति ऐसे कहते हैं । यह बडे कष्टसे साध्य होय ॥ मूत्रातीतके लक्षण । चिरं धारयतो मूत्रं त्वरया न प्रवर्तते । मेहमानस्य मन्दं वा मूत्रातीतः स उच्यते ॥ ७ ॥ मूत्रको बहुत देर रोकनेसे पीछे वह जल्दी नहीं उतरे । मूतते समय धीरे धीरे उतरे इस रोगको मूत्रातीत कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA