भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 404 में से

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पृष्ठ 220

(२०२) माधव निदान। श्वास, खांसी होय, त्वचा नख नेत्रादिक सफेद हों पेट निश्चल चिकना सफेद नाडियोंसे व्याप्त हो, इनकी वृद्धि बहुत कालमें होय, पेट करडा और शीतल मालूम होय तथा भारी और स्थिर होय ॥ सन्निपातोदरके लक्षण । स्त्रियोऽन्नपानं नखरोममूत्रविडार्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः । यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो गरांश्र्व दुष्टाम्बुदूषीविषसेवनाद्वा ॥ १३ ॥ तेनाशु रक्तं कुपिताश्र्व दोषाः कुर्युः सुघोरं जठरं त्रिलिंगम् । तच्छीतवाते भृशदुर्दिने वा विशेषतः कुप्यति दह्यते च ॥ १४ ॥ स चातुरो मूर्च्छति हि प्रसक्तं पाण्डुः कृशः शुष्यति तृष्णया च । दूष्योदरं कीर्तितमेतदेव- खोटे आचरणवाली स्त्री जिस पुरुषको नख केश (बाल) मल मूत्र आर्तव (रजोदर्शनका रुधिर) मिला अन्नपान देय, अथवा जिसका शत्रु विष देवे अथवा दुष्टांबु (जहर मिला मछली तिनका पित्ता आदि औटा हुआ ऐसा जल) और दूषीविषे (मन्दविष) इनके सेवन करनेसे रुधिर और वातादिक दोष शीघ्र कुपित होकर अत्यन्त भयंकर त्रिदोषात्मक उदररोग उत्पन्न करते हैं, वे शीतकालमें अथवा शीतल पवन चले उस समय, अथवा जिस दिन वर्षाका झड लगे उस दिन विशेष करके कोपको प्राप्त हो और दाह होय (इसका कारण यह है कि, उस समय दूषीविषका कोप होय है) वह रोगी निरन्तर विषके संयोगसे मूर्च्छित होय देहका पीला वर्ण तथा कृश होय और परिश्रम करनेसे शोष होय, प्यास होय तो इसको दूष्योदर कहते हैं ॥ प्लीहोदरके लक्षण । -प्लीहोदरं कीर्तयतो निबोध ॥ १५ ॥ विदाह्यभिष्यन्दिरतस्य जन्तोः प्रदुष्टमत्यर्थमसृक्कफश्र्व । प्लीहाभिवृद्धिं कुरुतः प्रवृद्धौ प्लीहोत्थमेतज्जठरं वदन्ति ॥ १६ ॥ तद्वामपार्श्वे परिवृद्धिमेति विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र । मन्दज्वराग्निः कफपित्तलिंगैरुपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः ॥ १७ ॥ १ यदुक्तम्-जीर्णं विषन्नोषधिभिर्हृतं वा दावाग्निना वाऽऽतपशोषितं वा । स्वभावतो वा गुणविप्रहीणं विषं हि दूषीविषतामुपैति ॥ इति ॥ १ एतदेव सन्निपातोदरं दूष्योदरं कीर्तितं न पुनरधिकम् इत्यर्थः । रक्तं दूष्यं दूषयित्वा भवतीति दूष्योदरं किंवा परस्परं दूषयन्तीति दोषा एव दूष्यास्तैः कृतमुदरम् दूष्योदरम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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