भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 404 में से

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पृष्ठ 222

( २०४ ) माधवनिदान । बद्धगुदोदर कहते हैं । अथवा गुदाके ऊपर आंतोंको बद्ध होनेसे बद्धगुद कहते हैं । यह चरकका मत है ॥ क्षतोदरके लक्षण । शल्यं तथान्नोपहितं यदन्त्रं भुक्तं भिनत्त्यागतमन्यथा वा । तस्मात्स्रुतोऽन्त्रात्सलिलप्रकाशः स्रावः स्रवेद्वै गुदतस्तु भूयः॥२२॥ नाभेरधश्चोदरमेति वृद्धिं निस्तुद्यते दाल्यति चातिमात्रम् । एतत्परिस्राव्युदरं प्रदिष्टं- कांटा धूल आदिके साथ मिलकर पेटमें चला जाय अथवा पक्वाशयसे शल्या- दियुक्त अन्न विलोम (टेढ़ा तिरछा ) चलाजाय तब आंतोंको काटे और सीधा जाय तो नहीं काटे, अथवा जम्भाई अति अशन करनेसे आंत फटजाय सो चरकमें लिखा भी है उन फटे आंतोंके गलित पानीके समान स्राव पुनः गुदाके मार्ग होकर झरै, नाभिके नीचेका भाग बढ़ै, नोचनेकीसी तथा भेद ( चीरने ) कीसी पीडासे अत्यन्त व्यथित होय, इस क्षतोदरको ग्रन्थान्तरमें परिस्रावि उदर कहते हैं और इसीको छिद्रोदर कहते हैं यह गयदासका मत है ॥ जलोदरकी उत्पत्ति और लक्षण । -दकोदरं कीर्तयतो निबोध ॥ २३ ॥ यः स्नेहपीतोऽप्यनुवासितो वा वान्तो विरक्तोऽप्यथवा निरूढः । पिबेज्जलं शीतलमाशु तस्य स्रोतांसि दूष्यन्ति हि तद्वहानि ॥ २४॥ स्नेहोपलिप्तेष्वथ वापि तेषु दकोदरं पूर्ववदभ्युपैति । स्निग्धं महत्तत्परिवृद्धनाभि समाततं पूर्णमिवाम्बुना च ॥ यथा दृतिः क्षुभ्यति कम्पते च शब्दायते चापि दकोदरं तत् ॥२५॥ अब जलोदर कैसे होय है? उसको कहते हैं सुनो, जिसने स्नेह ( घृततैलादि ) पान करा होय अथवा अनुवासनबस्ति करी हो, वमन करा हो अथवा दस्त करे हों अथवा निरूहबस्ति करी होय, ऐसा पुरुष शीतलजल पीवे तब उसकी जल बहनेवाली नसोंके मार्ग तत्काल दुष्ट होय हैं, वे उदक बहनेवाले स्रोत ( मार्ग ) स्नेहसे उपलिप्त ( चिकने ) होनेसे पूर्ववत् ( अर्थात् अन्नरस उपस्नेह न्यायकरके अर्थात् इनको बाहर लायकर उदरको उत्पन्न करे ) जलोदर होय है उसमें चिकनापन दीखे, ऊंचा होय, १ " शर्करातृणलोष्टास्थिकंटकैरन्नसंयुतैः । भिद्येतान्त्रं यदा भुक्तैर्जृम्भयात्यशनेन वा ॥"इति॥

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