माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २०९ ) समुद्रकी पवन लगनेसे, भिलावेके तेल लग जानेसे और कौंचकी फलीके स्पर्श होनेसे जो सूजन होय सो चारों तरफ फैल जाय, अत्यन्त दाह होय, उसका रंग लाल होय और विशेषकरके इससे पित्तके लक्षण होते हैं ॥ विषजशोथके लक्षण। विषजः सविषप्राणिपरिसर्पणमूत्रणात् । दंष्ट्रादन्तनखाघातादविषप्राणिनामपि ॥ १३ ॥ विण्मूत्रशुक्रोपहतमलवद्वस्त्रसंकरात् । विषवृक्षानिलस्पर्शाद्विषयोगावचूर्णनात् ॥ १४ ॥ मृदुश्चलोऽवलम्बी च शीघ्रो दाहरुजाकरः । विषवाले प्राणियोंके अंगपर चलनेसे अथवा मूतनेके अथवा निर्विष (विष- रहित मनुष्यादिक) प्राणियोंके दाढ दांत नख लगनेसे अथवा सविष प्राणियोंकी विष्ठा मूत्र शुक्र इनसे भरा अथवा मलिन वस्त्र अंगमें लगनेसे अथवा विषवृक्षकी हवाके लगनेसे अथवा संयोगज विषके अंगमें लगनेसे जो सूजन उत्पन्न होय सो विषज कहलाती है। वह सूजन नरम, चंचल, भीतर प्रवेश करनेवाली, जल्दी प्रगट होनेवाली, दाह और पीडा करनेवाली होती है ॥ जिस जिस ठिकाने दोष सूजन उत्पन्न करें उनको कहते हैं- दोषाः श्वयथुमूर्ध्वं हि कुर्वन्त्यामाशयस्थिताः ॥ १५ ॥ पक्वाशयस्था मध्ये तु वर्चःस्थानगतास्त्वधः । कृत्स्नदेहमनुप्राप्ताः कुर्युः सर्वरसं तथा ॥ १६ ॥ आमाशयस्थित दोष ऊपर (उरःस्थानादिकोंमें) सूजनको करें, पक्वाशयमें स्थित दोष मध्य कहिये उर और पक्वाशय इन दोनोंके बीचमें सूजन करें, मूलस्थान- गत दोष नीचेके स्थान (पैर आदि) में सूजन करें और सर्व देहमें दोष स्थित होनेसे सब देहमें सूजनको करते हैं ॥ सूजनके कृच्छादिभेद । यो मध्यदेशे श्वयथुः स कष्टः सर्वगश्च यः । अधोऽङ्गेऽरिष्टभूतः स्याद्यश्चोर्ध्वं परिसर्पति ॥ १७ ॥ जो सूजन मध्यदेशमें तथा सब शरीरमें होय अथवा सान्निपातिक होय वह कष्ट- साध्य है और पुरुषके नीचेके अंगमें प्रगट हो, ऊपरको चढे वह असाध्य है और चकारसे स्त्रीकी सूजन ऊपरसे नीचेको उतरे वह भी असाध्य है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA