भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 251

भाषाटीकासमेत । ( २३३ ) छिन्नके लक्षण । तिर्यक्छिन्न ऋजुर्वापि यो व्रणस्त्वायतो भवेत् । गात्रस्य पातनं तद्धि छिन्नमित्यभिधीयते ॥ ३ ॥ जो व्रण तिरछा छिद्रयुक्त, सरल ( सीधा ) अथवा लम्बा होय शरीरके अवयवके एकदेशको गिरानेवाला होय उसको छिन्न व्रण कहते हैं ॥ भिन्नके लक्षण । शक्तिकुंतेषुखड्गाग्रविषाणैराशयो हतः । यत्किंचित्स्रवते तद्धि भिन्नलक्षणमुच्यते ॥ ४ ॥ बर्छी, भाला, बाण, तरवारके अग्रभाग, विषाण ( दांत सींग ) इनसे आशय (धात्वाशय और मलाशय ) को वेधकर थोडासा स्राव होय अर्थात् रुधिर मूत्रादि आशयोंमेसे जो आशय भिन्न हुआ हो उससे उसका स्राव हो, जैसे बस्तिके भिन्न होनेपर मूत्र निकले उसको भिन्न कहते हैं ॥ कोष्ठके लक्षण । स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च । हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥ ५ ॥ आमाशय, अग्न्याशय, पक्वाशय, रक्ताशय ( यकृत् प्लीहा ) हृदय, मलाशय और फुप्फुस इन स्थानोंकी कोष्ठसंज्ञा है ॥ कोष्ठके भेदोंके लक्षण । तस्मिन्भिन्ने रक्तपूर्णे ज्वरो दाहश्च जायते । मूत्रमार्गगुदास्येभ्यो रक्तं घ्राणाच्च गच्छति ॥ ६ ॥ मूर्च्छा श्वासतृषाध्मानमभक्तच्छन्द एव च । विण्मूत्रवातसङ्गश्च स्वेदास्रावोऽक्षिरक्तता ॥ ७ ॥ लोहगंधित्वमास्यस्य गात्रदौर्गन्ध्यमेव च । हृच्छूलं पार्श्वयोश्चापि विशेषं चात्र मे शृणु ॥ ८ ॥ वह कोष्ठ भिन्न होकर रुधिरसे भरजावे तब ज्वर दाह होय है, मूत्रमार्ग, गुदा, मुख और नाक इनमेंसे रुधिर बहै, मूर्च्छा, श्वास, प्यास पेटका फूलना, अन्नमें अरुचि, मल, मूत्र, अधोवायु इनका अवरोध, पसीना बहुत आवे, नेत्रोंमें लाली, मुखमें CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA