भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 404 में से

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( २३२ ) माधवनिदान । प्राणमांसक्षयश्वासकासारोचकपीडिताः ॥ १६ ॥ प्रवृद्धपूयरुधिरा व्रणा येषां च मर्मसु । क्रियाभिः सम्यगारब्धा न सिध्यन्ति च ये व्रणाः । वर्जयेदेव तान्वैद्यः संरक्षन्नात्मनो यशः ॥ १७ ॥ जो व्रण मर्मस्थानमें प्रगट हुए हों और उनमेंसे अत्यन्त पीडा होय वे तथा जिस व्रणके भीतर दाह होय और बाहर शीतल होय वे अथवा बाहर दाह होय और भीतर शीतलता होय वे तथा जिनमें बल मांस इनका क्षय होय, श्वास, खांसी, अरुचि इनसे अत्यन्त पीडित होय ऐसे अथवा जो व्रण मर्मस्थानमें प्रगट भये हों उनमेंसे राध, रुधिर बहुत बहे वे अथवा जिन व्रणोंकी अच्छी चिकित्सा करनेसे भी अच्छे न होयं ऐसे व्रणोंको अपने यशकी रक्षा करनेवाला वैद्य त्याग दे ॥ व्रणरोगमें अपथ्य । व्रणे श्वयथुरायासात्स च रागश्च जागरात् । तौ च रुक् च दिवास्वापात्तांश्च मृत्युश्च मैथुनात् ॥ १८ ॥ परिश्रम करनेसे व्रणमें सूजन होती है और जागनेसे ललोही होती है और दिनमें सोनेसे सूजनपर लाली आकर पीडा होती है और मैथुन करनेसे सूजन लाली पीडा मृत्यु होय ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माधुरीभाषाटीकायां शारीरव्रणनिदानं समाप्तम् ॥

अथागन्तुजव्रणनिदानम् । नानाधारामुखैः शस्त्रैर्नानास्थाननिपातितैः । भवंति नानाकृतयो व्रणास्तांस्तान्निबोध मे ॥ १ ॥ अनेक प्रकारकी धारवाले तथा मुखवाले शस्त्र अनेक ठिकानेपर लगानेसे अनेक प्रकारकी आकृति (स्वरूप) के व्रण होते हैं उनको कहता हूं ॥ व्रणकी संख्या और सम्प्राप्ति । छिन्नं भिन्नं तथा विद्धं क्षतं पिच्चितमेव च । घृष्टमाहुस्तथा षष्ठं तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २ ॥ छिन्न, भिन्न, विद्ध, क्षत, पिच्चित और छठा घृष्ट ऐसे आगन्तुज व्रण छः प्रकारके होते हैं उनके लक्षण कहता हूं ॥

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