माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । (२६७) इसके संयोगसे सर्व शरीर अङ्गारोंसे भरासा मालूम होय, जिस जिस ठिकाने वह विसर्प फैले उसी ठिकानेपर अग्निरहित अङ्गारके समान काला नीला लाल होकर शीघ्र सूजे, आगसे फूँकेके समान ऊपर फफोला होय और उस विसर्पकी शीघ्र गति होनेसे जल्दी हृदयमें जाकर मर्मानुसारी विसर्प होय और उससे वायु अत्यन्त बलवान् होय, अंगोंको व्यथा करे, संज्ञा और निद्रा इनका नाश होय, श्वास बढ़ावे, हिचकी उत्पन्न करे, ऐसी मनुष्यकी अवस्था होनेके कारण धरती, तेज, आसन इत्यादिकोंमें सुख नहीं होय, हलने चलनेसे क्लेश होय, मन तथा देहको क्लेश होनेसे उत्पन्न भई ऐसी दुर्बोध निद्रा (मरणरूपी निद्रा) को प्राप्त होय, इस रोगको अग्निविसर्प कहते हैं॥ ग्रन्थि विसर्पके लक्षण । कफेन रुद्धः पवनो भित्त्वा तं बहुधा कफम् ॥ १३ ॥ रक्तं वा वृद्धरक्तस्य त्वक्छिरास्नायुमांसगम् । दूषयित्वा च दीर्घाणुवृत्तस्थूलखरात्मनाम् ॥ १४ ॥ ग्रन्थीनां कुरुते मालां रक्तानां तीव्ररुग्ज्वराम् । श्वासकासातिसारास्यशोषहिक्कावमिभ्रमैः ॥ १५ ॥ मोहवैवर्ण्यमूर्च्छांगभंगाग्निसदनैर्युतम् । इत्ययं ग्रंथिवीसर्पः कफमारुतकोपजः ॥ १६ ॥ स्वहेतुसे कुपित भया कफ सो रुकी हुई पवन कफको भेदकर अथवा बढ़े हुए रुधिरको भेदकर त्वचा, नस, नाडी और मांस इनमें प्राप्त हो और इनको दुष्ट कर लम्बी, छोटी, गोल, मोटी, खरदरी, लाल गांठोंकी माला प्रगट करे. इन गांठोंमें पीडा अधिक होय, ज्वर होय. श्वास, खांसी, अतिसार, मुखमें पपडी पडे. हिचकी, वमन, भ्रमता, मोह, वर्णका पलटना, मूर्च्छा, अंगोंका टूटना, मन्दाग्नि ये लक्षण होते हैं, इस रोगको ग्रन्थिविसर्प कहते हैं, यह कफवायुके कोपसे उत्पन्न होता है, (इसको सुश्रुत अपची कहते हैं) ॥ कर्दमविसर्पके लक्षण । कफपित्ताज्ज्वरः स्तंभो निद्रा तंद्रा शिरोरुजा । अंगावसादविक्षेपप्रलापारोचकभ्रमाः ॥ १७ ॥ मूर्च्छाग्निहानिर्भेदोऽस्थ्नां पिपासेन्द्रियगौरवम् । आमोपवेशनं लेपः स्रोतसां स विसर्पति ॥ १८ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA