माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २६८ ) माधवनिदान । प्रायेणामाशयं गृह्णन्नैकदेशं न चातिरुक् । पिडिकैरिव कीर्णोऽतिपीतलोहितपांडुरैः ॥ १९ ॥ स्निग्धोऽसितो मेचकाभो मलिनः शोफवान् गुरुः । गंभीरपाकः प्राज्योष्मा स्पृष्टः क्लिन्नोऽवदीर्यते ॥ २० ॥ पंकवच्छीर्णमांसश्च स्पृष्टस्नायुशिरागणः । शवगंधी च वीसर्पं कर्दमारव्यमुशंति तम् ॥ २१ ॥ कफपित्तसे ज्वर, अंगोंका जकडना, निद्रा, तन्द्रा, मस्तकशल, अङ्गग्लानि, हाथ- पैरोंका पटकना, बकवाद, अरुचि, भ्रम, मूर्च्छा, मन्दाग्नि, हडफूटन, प्यास, इंद्रियोंका जकडना, आमका गिरना, मुखादि स्रोतों (छिद्रों) में कफका लेप इत्यादि लक्षण होते हैं तथा वह विसर्प आमाशयमें उत्पन्न हो पीछे सर्वत्र फैले, उसमें पीडा थोडी होय, उसमें सर्वत्र पीली तांबेके रंगकी सफेद रंगकी पिडिका होयं तथा वह विसर्प चिकनी स्याहीके समान काली, मलिन, सूजनयुक्त, भारी, गम्भीरपाक कहिये भीतरसे पकी हो उसमें घोर दाह और वह दबानेसे तत्क्षण गीली होजाय तथा वह फटजाय तथा कीचके समान होकर उसका मांस गल जाय, उसमें सिरा नाडी (नस) ये दीखने लगें, उसमें मुर्देकीसी वास आवे, इस विसर्पको कर्दमविसर्प कहते हैं ॥ क्षतजविसर्पके लक्षण। बाह्यहेतोः क्षतात्क्रुद्धः सरक्तं पित्तमीरयन् । विसर्पं मारुतः कुर्यात्कुलित्थसदृशैश्चितम् ॥ २२ ॥ स्फोटैः शोथज्वररुजादाहाढ्यं श्यावशोणितम् ॥ २३ ॥ बाह्यकारण करके क्षत (घाव) होकर उसमें वायु कुपित होकर वह रुधिर, सहित पित्तको व्रणमें प्राप्त कर विसर्परोग उत्पन्न करे, उसमें कुलथीके समान श्याम- वर्णके फोडे होते हैं, सूजन हो, ज्वर होय, पीडा होय और दाह होय, उसका रुधिर काला निकले इस विसर्पको पित्तविसर्पके अन्तर्गत जाननेसे संख्यामें विरुद्ध नहीं पडे अन्यथा संख्या बढजाती है यह भोजका मत है ॥ उपद्रव । ज्वरातिसारवमथुस्तृण्मांसदरणं क्लमः । अरोचकाविपाकौ च विसर्पाणामुपद्रवाः ॥ २४ ॥ ज्वर, अतिसार, वमन, प्यास, मांसका गलना, अनायास श्रम, अरुचि, अन्न न पचना ये विसर्परोगके उपद्रव हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA