माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८६ ) | माधवनिदान । लिंगको मर्दन करनेसे अथवा रगडनेसे, उसी प्रकार लिंगमें किसी प्रकारकी चोट लगनेसे व्यानवायु कुषित होकर उसके चर्ममें प्रवेश कर सर्वत्र विचरे उस समय वातसंस्पर्श हेतु करके लिंगकी चर्म पृथक् होजाय और शिश्नका कोश सूजकर मणिके नीचे गांठके समान होकर लटके, उसमें पीडा होय, दाह होय और कभी कभी वह पकजाय, इस पीडाको परिवर्त्तिका कहते हैं, यह वातसे होय है और जो कफसे होय तौ उसमें खुजली तथा कठिनता होती हैं ॥ अवपाटिकाके लक्षण । अल्पीयःखां यदा हर्षाद्बलाद्गच्छेत्स्त्रियं नरः । हस्ताभिघातादथवा चर्मण्युद्वर्त्तिते बलात् ॥ ४३ ॥ मर्दनात्पीडनाद्वापि शुक्रवेगविघाततः । यस्यावपाट्यते चर्म तां विद्यादवपाटिकाम् ॥ ४४ ॥ जिसकी योनिका छिद्र बारीक होय ऐसी स्त्रीसे बलपूर्वक मैथुन करनेसे अथवा हाथके अभिघात ( चोट ) से बलसे लिंगके चामको उलटनेसे अथवा मीडनेसे अथवा जोरपूर्वक दाबनेसे अथवा शुक्रके वेगको धारण करनेसे उस पुरुषके लिंगकी चाम फट जाय, इस पीडाको अवपाटिका कहते हैं । इस अवपाटिका रोगमें तीनों दोषोंके लक्षण पृथक् २ होते हैं यह मत भोजकाँ है ॥ निरुद्धप्रकाशके लक्षण । वातोपसृष्टे मेढ्रे तु चर्म संश्रयते मणिम् ॥ ४५ ॥ मणिश्चर्मोपनद्धस्तु मूत्रस्रोतो रुणद्धि च । निरुद्धप्रकशे तस्मिन्मंदधारमवेदनम् ॥ ४६ ॥ मूत्रं प्रवर्त्तते जंतोर्मणिर्निव्रियते न च । निरुद्धप्रकाशं विद्यात्सरुजं वातसंभवम् ॥ ४७ ॥ वायुके योगसे लिंग पीडित होनेसे चामडी सूजकर मणिभागमें प्राप्त होय वह मणि चर्मके संकोच होनेसे मूत्रके मार्गको रोके तब मूत्रका रोध होय, तब उस पुरुषका मूत्र ठहर ठहरकर निकले, परन्तु पीडा नहीं होय और मणि बाहर नहीं निकले, इस रोगयुक्त वातजन्य पीडाको निरुद्धप्रकाश कहते हैं, चर्मके संकोच होनेको निरुद्ध कहते हैं, और मूत्रकी धार मन्द निकलनेको प्रकाश कहते हैं। १ मर्दनादभिघाताद्वा कन्यायोनिप्रपीडनात् । लक्ष्यते यदि मेढ्रस्य चर्म दभारिव क्षतम् ॥ अवपातिकेति तां विद्यात्पृथग्दोषैः समन्विताम् । वातात्सा परुषा रूक्षा शूलनिस्तोदकारिणी ॥ पित्तात्सदाहा रक्ताद्वा दाहतृष्णासमन्विता । श्लैष्मिकी कठिना स्निग्धा कण्डूमत्यल्पवेदना ॥