भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । (५३) अथ ग्रहणीनिदानम् । ग्रहणीकी सम्प्राप्ति । अतिसारे निवृत्तेऽपि मन्दाग्नेरहिताशिनः । भूयः संदूषितो वह्निर्ग्रहणीमभिदूषयेत् ॥ १ ॥ पहले मनुष्यके अतिसाररोग होकर जाता रहा होय फिर उस मनुष्यके कुपथ्य करनेसे मन्द हुई जो अग्नि पुरुषके उदरमें रहनेवाली जो पित्तधरानामक छठी कला जिसको ग्रहणी कहते हैं उसको बिगाड, अपिशब्द करके अतिसार न भया होय तो भी अपने कारण करके पूर्वोक्त ग्रहणीको बिगाडकर ग्रहणीरोगको प्रगट करे यह सूचना करी। कोई आचार्य ऐसे कहते हैं कि, अतिसार न गया होय, बीचमें ही ग्रहणीरोग होता है। "मन्दाग्नि" इस पद करकेयह सूचना करी कि, जिस पुरुषकी अग्नि तीक्ष्ण है वह कुपथ्य भी करे तथापि कुछ अवगुण नहीं होय, अन्नको ग्रहण करे है इसीसे इसको ग्रहणी कहे हैं, इसीसे ग्रहणी बिगडनेसे अन्नका परिपाक अच्छे प्रकार नहीं होय अर्थात् बारम्बार आम मिश्रित मल गुदाके मार्गसे गिरता है ॥ ग्रहणीरोगकी सम्प्राप्तिपूर्वक सामान्य लक्षण । एकैकशः सर्वशश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः । सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥ २ ॥ पक्वं वा सरुजं पूति मुहुर्बद्धं मुहुर्द्रवम् । ग्रहणीरोगमाहुस्तमायुर्वेदविदो जनाः ॥ ३ ॥ अत्यन्त कुपित हुए पृथक् १ दोष ( वात, पित्त, कफ ) और सर्व दोष मिलकर ग्रहणीको दुष्ट करें सो ग्रहणी दुष्ट होकर भोजन किये हुए पदार्थको कच्चा अथवा पक्का गुदाके मार्ग होकर निकाले और पीडा होय तथा उस मलमें दुर्गंध आवे, वादीसें पतला मल और पित्तसे गाढा दस्त बारम्बार होवे और कभी कफसे पानी सरीखा अधोवायुयुक्त निकले इसको आयुर्वेदके जाननेवाले वैद्य ग्रहणीरोग कहते हैं ॥ ग्रहणीके पूर्वरूप । पूर्वरूपं तु तस्येदं तृष्णाऽलस्यं बलक्षयः । विदाहोऽन्नस्य पाकश्च चिरात्कायस्य गौरवम् ॥ ४ ॥ प्यास, आलसक, बलनाश, अन्नका दाह ( पाकके समय अग्निसि जले ) और अन्नका पाक देरमें होय, देह भारी होय, यह ग्रहणीरोगका पूर्वरूप है ॥ १ यथाह चरके-" अग्न्यधिष्ठानमन्त्रस्य ग्रहणाद्ग्रहणी मता । नाभेरुपरि सा ह्यग्निबले- नस्तम्भबृंहिता । अपक्वं धारयत्यन्नं पक्वं सृजति चाप्यधः ॥"