महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1014, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरना' ॥ १४ ॥ तथेति च प्रतिज्ञाय द्रोणाय कुरुपुङ्गवः । उपसंगृह्य चरणौ स प्रायादुत्तरां दिशम् ॥ १५ ॥ यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने 'बहुत अच्छा' कहते हुए उनकी इस आज्ञाका पालन करनेकी प्रतिज्ञा की और गुरुके दोनों चरण पकड़कर उन्होंने सर्वोत्तम उपदेश प्राप्त कर लिया ॥ १५ ॥ स्वभावादगमच्छब्दो महीं सागरमेखलाम् । अर्जुनस्य समो लोके नास्ति कश्चिद् धनुर्धरः ॥ १६ ॥ इस प्रकार समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर सब ओर अपने-आप ही यह बात फैल गयी कि संसारमें अर्जुनके समान दूसरा कोई धनुर्धर नहीं है ॥ १६ ॥ गदायुद्धेऽसियुद्धे च रथयुद्धे च पाण्डवः । पारगश्च धनुर्युद्धे बभूवाथ धनंजयः ॥ १७ ॥ पाण्डुनन्दन धनंजय गदा, खड्ग, रथ तथा धनुषद्वारा युद्ध करनेकी कलामें पारंगत हुए ॥ १७ ॥ नीतिमान् सकलां नीतिं विबुधाधिपतेस्तदा । अवाप्य सहदेवोऽपि भ्रातॄणां ववृते वशे ॥ १८ ॥ द्रोणेनैव विनीतश्च भ्रातॄणां नकुलः प्रियः । चित्रयोधी समाख्यातो बभूवातिरथोदितः ॥ १९ ॥ सहदेव भी उस समय द्रोणके रूपमें अवतीर्ण देवताओंके आचार्य बृहस्पतिसे सम्पूर्ण नीतिशास्त्रकी शिक्षा पाकर नीतिमान् हो अपने भाइयोंके अधीन (अनुकूल) होकर रहते थे। नकुलने भी द्रोणाचार्यसे ही अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा पायी थी। वे अपने भाइयोंको बहुत ही प्रिय थे और विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेमें उनकी बड़ी ख्याति थी। वे अतिरथी वीर कहे जाते थे ॥ १८-१९ ॥ त्रिवर्षकृतयज्ञस्तु गन्धर्वाणामुपप्लवे । अर्जुनप्रमुखैः पार्थैः सौवीरः समरे हतः ॥ २० ॥ न शशाक वशे कर्तुं यं पाण्डुरपि वीर्यवान् । सोऽर्जुनेन वशं नीतो राजाऽऽसीद् यवनाधिपः ॥ २१ ॥ सौवीर देशका राजा, जो गन्धर्वोंके उपद्रव करनेपर भी लगातार तीन वर्षोंतक बिना किसी विघ्न-बाधाके यज्ञोंका अनुष्ठान करता रहा, युद्धमें अर्जुन आदि पाण्डवोंके हाथों मारा गया। पराक्रमी राजा पाण्डु भी जिसे वशमें न ला सके थे, उस यवनदेश (यूनान)-के राजाको भी जीतकर अर्जुनने अपने अधीन कर लिया ॥ २०-२१ ॥ अतीव बलसम्पन्नः सदा मानी कुरून् प्रति । विपुलो नाम सौवीरः शस्तः पार्थेन धीमता ॥ २२ ॥