महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदत्तामित्र इति ख्यातं संग्रामे कृतनिश्चयम् ।
सुमित्रं नाम सौवीरमर्जुनोऽदमयच्छरैः ॥ २३ ॥
जो अत्यन्त बली तथा कौरवोंके प्रति सदा अभिमान एवं उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव करनेवाला था, वह सौवीरनरेश विपुल भी बुद्धिमान् अर्जुनके हाथसे संग्रामभूमिमें मारा गया। जो सदा युद्धके लिये दृढ़ संकल्प किये रहता था, जिसे लोग दत्तामित्रके नामसे जानते थे, उस सौवीरनिवासी सुमित्रका भी अर्जुनने अपने बाणोंसे दमन कर दिया ॥ २२-२३ ॥
भीमसेनसहायश्च रथानामयुतं च सः ।
अर्जुनः समरे प्राच्यान् सर्वानैकरथोऽजयत् ॥ २४ ॥
इसके सिवा अर्जुनने केवल भीमसेनकी सहायतासे एकमात्र रथपर आरूढ़ हो युद्धमें पूर्व दिशाके सम्पूर्ण योद्धाओं तथा दस हजार रथियोंको जीत लिया ॥ २४ ॥
तथैवैकरथो गत्वा दक्षिणामजयद् दिशम् ।
धनौघं प्रापयामास कुरुराष्ट्रं धनंजयः ॥ २५ ॥
इसी प्रकार एकमात्र रथसे यात्रा करके धनंजयने दक्षिण दिशापर भी विजय पायी और अपने 'धनंजय' नामको सार्थक करते हुए कुरुदेशकी राजधानीमें धनकी राशि पहुँचायी ॥ २५ ॥
एवं सर्वे महात्मानः पाण्डवा मनुजोत्तमाः ।
परराष्ट्राणि निर्जित्य स्वराष्ट्रं ववृधुः पुरा ॥ २६ ॥
जनमेजय! इस तरह नरश्रेष्ठ महामना पाण्डवोंने प्राचीन कालमें दूसरे राष्ट्रोंको जीतकर अपने राष्ट्रकी अभिवृद्धि की ॥ २६ ॥
ततो बलमतिख्यातं विज्ञाय दृढधन्विनाम् ।
दूषितः सहसा भावो धृतराष्ट्रस्य पाण्डुषु ।
स चिन्तापरमो राजा न निद्रामलभन्निशि ॥ २७ ॥
तब दृढ़तापूर्वक धनुष धारण करनेवाले पाण्डवोंके अत्यन्त विख्यात बल-पराक्रमकी बात जानकर उनके प्रति राजा धृतराष्ट्रका भाव सहसा दूषित हो गया। अत्यन्त चिन्तामें निमग्न हो जानेके कारण उन्हें रातमें नींद नहीं आती थी ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रचिन्तायामष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रकी चिन्ताविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३८ ॥