भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1018

'राजाको सर्वदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना चाहिये और सदा ही पुरुषार्थ प्रकट करना चाहिये। राजा अपना छिद्र—अपनी दुर्बलता प्रकट न होने दे; परंतु दूसरोंके छिद्र या दुर्बलतापर सदा ही दृष्टि रखे और यदि शत्रुओंकी निर्बलताका पता चल जाय तो उनपर आक्रमण कर दे ।। ६ ।।

नित्यमुद्यतदण्डाद्धि भृशमुद्विजते जनः ।
तस्मात् सर्वाणि कार्याणि दण्डेनैव विधारयेत् ।। ७ ।।
'जो सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहता है, उससे प्रजाजन बहुत डरते हैं; इसलिये सब कार्य दण्डके द्वारा ही सिद्ध करे ।। ७ ।।

नास्यच्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेण परमान्वियात् ।
गूहेत् कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद् विवरमात्मनः ।। ८ ।।
नासम्यक्कृतकारी स्यादुपक्रम्य कदाचन ।
कण्टको ह्यपि दुश्छिन्न आस्रावं जनयेच्चिरम् ।। ९ ।।
'राजाको इतनी सावधानी रखनी चाहिये, जिससे शत्रु उसकी कमजोरी न देख सके और यदि शत्रु की कमजोरी प्रकट हो जाय तो उसपर अवश्य चढ़ाई करे। जैसे कछुआ अपने अंगोंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार राजा अपने सब अंगों (राजा, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, बल और सुहृद्)-की रक्षा करे और अपनी कमजोरीको छिपाये रखे। यदि कोई कार्य शुरू कर दे तो उसे पूरा किये बिना कभी न छोड़े; क्योंकि शरीरमें गड़ा हुआ काँटा यदि आधा टूटकर भीतर रह जाय तो वह बहुत दिनोंतक मवाद देता रहता है ।। ८-९ ।।

वधमेव प्रशंसन्ति शत्रूणामपकारिणाम् ।
सुविदीर्णं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ।। १० ।।
आपद्यापदि काले च कुर्वीत न विचारयेत् ।
नावज्ञेयो रिपुस्तात दुर्बलोऽपि कथंचन ।। ११ ।।
'अपना अनिष्ट करनेवाले शत्रुओंका वध कर दिया जाय, इसीकी नीतिज्ञ पुरुष प्रशंसा करते हैं। अत्यन्त पराक्रमी शत्रुको भी आपत्तिमें पड़ा देख उसे सुगमतापूर्वक नष्ट कर दे। इसी प्रकार जो अच्छी तरह युद्ध करनेवाला शत्रु है, उसे भी आपत्तिकालमें ही अनायास ही मार भगाये। आपत्तिके समय शत्रु का संहार अवश्य ही करे। उस समय उसके सम्बन्ध या सौहार्द आदिका विचार कदापि न करे। तात! शत्रु दुर्बल हो, तो भी किसी प्रकार उसकी उपेक्षा न करे ।। १०-११ ।।

अल्पोऽप्यग्निर्वर्नं कृत्स्नं दहत्याश्रयसंश्रयात् ।
अन्धः स्यादन्धवेलायां बाधिर्यमपि चाश्रयेत् ।। १२ ।।
'क्योंकि जैसे थोड़ी-सी भी आग ईंधनका सहारा मिल जानेपर समूचे वनको जला देती है, उसी प्रकार छोटा शत्रु भी दुर्ग आदि प्रबल आश्रयका सहारा लेकर विनाशकारी बन जाता है। अंधा बननेका अवसर आनेपर अंधा बन जाय—अर्थात् अपनी असमर्थताके

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