भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1019, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1019

समय शत्रुके दोषोंको न देखे। उस समय सब ओरसे धिक्कार और निन्दा मिलनेपर भी उसे अनसुनी कर दे अर्थात् उसकी ओरसे कान बंद करके बहरा बन जाय ॥ १२ ॥

कुर्यात् तृणमयं चापं शयीत मृगशायिकाम् ।
सान्त्वादिभिरुपायैस्तु हन्याच्छत्रुं वशे स्थितम् ॥ १३ ॥
'ऐसे समयमें अपने धनुषको तिनकेके समान बना दे अर्थात् शत्रुको दृष्टिमें सर्वथा दीन-हीन एवं असमर्थ बन जाय; परंतु व्याधकी भाँति सोये—अर्थात् जैसे व्याध झूठे ही नींदका बहाना करके सो जाता है और जब मृग विश्वस्त होकर आसपास चरने लगते हैं, तब उठकर उन्हें बाणोंसे घायल कर देता है, उसी प्रकार शत्रुको मारनेका अवसर देखते हुए ही अपने स्वरूप और मनोभावको छिपाकर असमर्थ पुरुषोंका-सा व्यवहार करे। इस प्रकार कपटपूर्ण बर्तावसे वशमें आये हुए शत्रुको साम आदि उपायोंसे विश्वास उत्पन्न करके मार डाले' ॥ १३ ॥

दया न तस्मिन् कर्तव्या शरणागत इत्युत ।
निरुद्विग्नो हि भवति नहताज्जायते भयम् ॥ १४ ॥
'यह मेरी शरणमें आया है, यह सोचकर उसके प्रति दया नहीं दिखानी चाहिये। शत्रुको मार देनेसे ही राजा निर्भय हो सकता है। यदि शत्रु मारा नहीं गया तो उससे सदा ही भय बना रहता है ॥ १४ ॥

हन्यादमित्रं दानेन तथा पूर्वापकारिणम् ।
हन्यात् त्रीन् पञ्च सप्तैति परपक्षस्य सर्वशः ॥ १५ ॥
'जो सहज शत्रु है, उसे मुँहमाँगी वस्तु देकर—दानके द्वारा विश्वास उत्पन्न करके मार डाले। इसी प्रकार जो पहलेका अपकारी शत्रु हो और पीछे सेवक बन गया हो, उसे भी जीवित न छोड़े। शत्रुपक्षके त्रिवर्ग१, पंचवर्ग२ और सप्तवर्गका३ सर्वथा नाश कर डाले ॥ १५ ॥

मूलमेवादितश्छिन्द्यात् परपक्षस्य नित्यशः ।
ततः सहायांस्तत्पक्षान् सर्वांश्च तदनन्तरम् ॥ १६ ॥
'पहले तो सदा शत्रुपक्षके मूलका ही उच्छेद कर डाले। तत्पश्चात् उसके सहायकों और शत्रुपक्षसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी लोगोंका संहार कर दे ॥ १६ ॥

छिन्नमूले ह्यधिष्ठाने सर्वे तज्जीविनो हताः ।
कथं नु शाखास्तिष्ठेरंश्छिन्नमूले वनस्पतौ ॥ १७ ॥
'यदि मूल आधार नष्ट हो जाय तो उसके आश्रयसे जीवन धारण करनेवाले सभी शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं। यदि वृक्षकी जड़ काट दी जाय तो उसकी शाखाएँ कैसे रह सकती हैं? ॥ १७ ॥

एकाग्रः स्यादविवृतो नित्यं विवरदर्शकः ।
राजन् नित्यं सपत्नेषु नित्योद्विग्नः समाचरेत् ॥ १८ ॥

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व · पृष्ठ 1019, कुल 2256 में से · BharatKosha