भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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खाया ।। ४९ ।। एवं समाचरन्नित्यं सुखमेधेत भूपतिः । भयेन भेदयेद् भीरुं शूरमञ्जलिकर्मणा ।। ५० ।। राजन्! ऐसा ही आचरण करनेवाला राजा सदा सुखसे रहता और उन्नतिको प्राप्त होता है। डरपोकको भय दिखाकर फोड़ ले तथा जो अपनेसे शूरवीर हो, उसे हाथ जोड़कर वशमें करे ।। ५० ।।

लुब्धमर्थप्रदानेन समं न्यूनं तथौजसा । एवं ते कथितं राजञ्शृणु चाप्यपरं तथा ।। ५१ ।। लोभीको धन देकर तथा बराबर और कमजोरको पराक्रमसे वशमें करे। राजन्! इस प्रकार आपसे नीतियुक्त बर्तावका वर्णन किया गया। अब दूसरी बातें सुनिये ।। ५१ ।।

पुत्रः सखा वा भ्राता वा पिता वा यदि वा गुरुः । रिपुस्थानेषु वर्तन्तो हन्तव्या भूतिमिच्छता ।। ५२ ।। पुत्र, मित्र, भाई, पिता अथवा गुरु—कोई भी क्यों न हो, जो शत्रुके स्थानपर आ जायँ—शत्रुवत् बर्ताव करने लगें, तो उन्हें वैभव चाहनेवाला राजा अवश्य मार डाले ।। ५२ ।।

शपथेनाप्यर्रिं हन्यादर्थदानेन वा पुनः । विषेण मायया वापि नोपेक्षेत कथंचन । उभौ चेत् संशयोपेतौ श्रद्धावांस्तत्र वर्द्धते ।। ५३ ।। सौगंध खाकर, धन अथवा जहर देकर या धोखेसे भी शत्रुको मार डाले। किसी तरह भी उसकी उपेक्षा न करे। यदि दोनों राजा समानरूपसे विजयके लिये यत्नशील हों और उनकी जीत संदेहास्पद जान पड़ती हो तो उनमें भी जो मेरे इस नीतिपूर्ण कथनपर श्रद्धा-विश्वास रखता है, वही उन्नतिको प्राप्त होता है ।। ५३ ।।

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ।। ५४ ।। यदि गुरु भी घमंडमें भरकर कर्तव्य और अकर्तव्यको न जानता हो तथा बुरे मार्गपर चलता हो तो उसे भी दण्ड देना उचित माना जाता है ।। ५४ ।।

क्रुद्धोऽप्यक्रुद्धरूपः स्यात् स्मितपूर्वाभिभाषिता । न चाप्यन्यमपध्वंसेत् कदाचित् कोपसंयुतः ।। ५५ ।। प्रहरिष्यन् प्रियं ब्रूयात् प्रहरन्नपि भारत । प्रहृत्य च कृपायीत शोचेत च रुदेत च ।। ५६ ।। मनमें क्रोध भरा हो, तो भी ऊपरसे क्रोधशून्य बना रहे और मुसकराकर बातचीत करे। कभी क्रोधमें आकर किसी दूसरेका तिरस्कार न करे। भारत! शत्रुपर प्रहार करनेसे पहले और प्रहार करते समय भी उससे मीठे वचन ही बोले। शत्रुको मारकर भी उसके प्रति दया दिखाये, उसके लिये शोक करे तथा रोये और आँसू बहाये ।। ५५-५६ ।।