महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततः स्नात्वा स वै तत्र आजगाम वृको नृप ।। ४२ ।।
यह बात सुनकर चूहा अत्यन्त भयभीत होकर बिलमें घुस गया। राजन्! तत्पश्चात् भेड़िया भी स्नान करके वहाँ आ पहुँचा ।। ४२ ।।
तमागतमिदं वाक्यमब्रवीज्जम्बुकस्तदा ।
मृगराजो हि संक्रुद्धो न ते साधु भविष्यति ।। ४३ ।।
सकलत्रस्त्विहायाति कुरुष्व यदनन्तरम् ।
एवं संचोदितस्तेन जम्बुकेन तदा वृकः ।। ४४ ।।
ततोऽवलुम्पनं कृत्वा प्रयातः पिशिताशनः ।
एतस्मिन्नेव काले तु नकुलोऽप्या जगाम ह ।। ४५ ।।
उसके आनेपर गीदड़ने इस प्रकार कहा—'भेड़िया भाई! आज बाघ तुमपर बहुत नाराज हो गया है, अतः तुम्हारी खैर नहीं; वह अभी बाघिनको साथ लेकर यहाँ आ रहा है। इसलिये अब तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो।' गीदड़के इस प्रकार कहनेपर कच्चा मांस खानेवाला वह भेड़िया दुम दबाकर भाग गया। इतनेमें ही नेवला भी आ पहुँचा ।। ४३—४५ ।।
तमुवाच महाराज नकुलं जम्बुको वने ।
स्वबाहुबलमाश्रित्य निर्जितास्तेऽन्यतो गताः ।। ४६ ।।
मम दत्त्वा नियुद्धं त्वं भुङ्क्ष्व मांसं यथेप्सितम् ।
महाराज! उस नेवलेसे गीदड़ने वनमें इस प्रकार कहा—'ओ नेवले! मैंने अपने बाहुबलका आश्रय ले उन सबको परास्त कर दिया है। वे हार मानकर अन्यत्र चले गये। यदि तुझमें हिम्मत हो तो पहले मुझसे लड़ ले; फिर इच्छानुसार मांस खाना' ।। ४६ १/२ ।।
नकुल उवाच
मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूषिकः ।। ४७ ।।
निर्जिता यत् त्वया वीरास्तस्माद् वीरतरो भवान् ।
न त्वयाप्युत्सहे योद्धुमित्युक्त्वा सोऽप्युपागमत् ।। ४८ ।।
नेवलेने कहा—जब बाघ, भेड़िया और बुद्धिमान् चूहा—ये सभी वीर तुमसे परास्त हो गये, तब तो तुम वीरशिरोमणि हो। मैं भी तुम्हारे साथ युद्ध नहीं कर सकता। यों कहकर नेवला भी चला गया ।। ४७-४८ ।।
कणिक उवाच
एवं तेषु प्रयातेषु जम्बुको हृष्टमानसः ।
खादति स्म तदा मांसमेकः सन् मन्त्रनिश्चयात् ।। ४९ ।।
कणिक कहते हैं—इस प्रकार उन सबके चले जानेपर अपनी युक्तिमें सफल हो जानेके कारण गीदड़का हृदय हर्षसे खिल उठा। तब उसने अकेले ही वह मांस