भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 104

दर्शनं बृहदश्वस्य महर्षेर्भावितात्मनः । युधिष्ठिरस्य चार्तस्य व्यसनं परिदेवनम् ॥ १६० ॥

इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिरको शुद्धहृदय महर्षि बृहदश्वका दर्शन हुआ। युधिष्ठिरने आर्त होकर उन्हें अपनी दुःखगाथा सुनायी और विलाप किया ॥ १६० ॥

नलोपाख्यानमत्रैव धर्मिष्ठं करुणोदयम् । दमयन्त्याः स्थितैर्यत्र नलस्य चरितं तथा ॥ १६१ ॥

इसी प्रसंगमें नलोपाख्यान आता है, जिसमें धर्मनिष्ठाका अनुपम आदर्श है और जिसे पढ़-सुनकर हृदयमें करुणाकी धारा बहने लगती है। दमयन्तीका दृढ़ धैर्य और नलका चरित्र यहीं पढ़नेको मिलते हैं ॥ १६१ ॥

तथाक्षहृदयप्राप्तिस्तस्मादेव महर्षितः । लोमशस्यागमस्तत्र स्वर्गात् पाण्डुसुतान् प्रति ॥ १६२ ॥ वनवासगतानां च पाण्डवानां महात्मनाम् । स्वर्गे वृत्तिराख्याता लोमशेनार्जुनस्य वै ॥ १६३ ॥

उन्हीं महर्षिसे पाण्डवोंको अक्षहृदय (जूएके रहस्य)-की प्राप्ति हुई। यहीं स्वर्गसे महर्षि लोमश पाण्डवोंके पास पधारे। लोमशने ही वनवासी महात्मा पाण्डवोंको यह बात बतलायी कि अर्जुन स्वर्गमें किस प्रकार अस्त्र-विद्या सीख रहे हैं ॥ १६२-१६३ ॥

संदेशादर्जुनस्यात्र तीर्थाभिगमनक्रिया । तीर्थानां च फलप्राप्तिः पुण्यत्वं चापि कीर्तितम् ॥ १६४ ॥

इसी पर्वमें अर्जुनका संदेश पाकर पाण्डवोंने तीर्थयात्रा की। उन्हें तीर्थयात्राका फल प्राप्त हुआ और कौन तीर्थ कितने पुण्यप्रद होते हैं—इस बातका वर्णन हुआ है ॥ १६४ ॥

पुलस्त्यतीर्थयात्रा च नारदेन महर्षिणा । तीर्थयात्रा च तत्रैव पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १६५ ॥ कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात् । तथा यज्ञविभूतिश्च गयस्यात्र प्रकीर्तिता ॥ १६६ ॥

इसके बाद महर्षि नारदने पुलस्त्यतीर्थकी यात्रा करनेकी प्रेरणा दी और महात्मा पाण्डवोंने वहाँकी यात्रा की। यहीं इन्द्रके द्वारा कर्णको कुण्डलोंसे वंचित करनेका तथा राजा गयके यज्ञवैभवका वर्णन किया गया है ॥ १६५-१६६ ॥

आगस्त्यमपि चाख्यानं यत्र वातापिभक्षणम् । लोपामुद्राभिगमनमपत्यार्थमृषेस्तथा ॥ १६७ ॥

इसके बाद अगस्त्य-चरित्र है, जिसमें उनके वातापिभक्षण तथा संतानके लिये लोपामुद्राके साथ समागमका वर्णन है ॥ १६७ ॥

ऋष्यशृङ्गस्य चरितं कौमारब्रह्मचारिणः । जामदग्न्यस्य रामस्य चरितं भूरितेजसः ॥ १६८ ॥