महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब श्रीकृष्णने यह सुना कि शकुनिने जूएमें पाण्डवोंको कपटसे हरा दिया है, तब वे अत्यन्त क्रोधित हुए; परंतु अर्जुनने हाथ जोड़कर उन्हें शान्त किया ॥ १५१ ॥ परिदेवनं च पाञ्चाल्या वासुदेवस्य संनिधौ । आश्वासनं च कृष्णेन दुःखार्तायाः प्रकीर्तितम् ॥ १५२ ॥ द्रौपदी श्रीकृष्णके पास बहुत रोयी-कलपी। श्रीकृष्णने दुःखार्त द्रौपदीको आश्वासन दिया। यह सब कथा वनपर्वमें है ॥ १५२ ॥ तथा सौभवधाख्यानमत्रैवोक्तं महर्षिणा । सुभद्रायाः सपुत्रायाः कृष्णेन द्वारकां पुरीम् ॥ १५३ ॥ नयनं द्रौपदेयानां धृष्टद्युम्नेन चैव ह । प्रवेशः पाण्डवेयानां रम्ये द्वैतवने ततः ॥ १५४ ॥ इसी पर्वमें महर्षि व्यासने सौभवधकी कथा कही है। श्रीकृष्ण सुभद्राको पुत्रसहित द्वारकामें ले गये। धृष्टद्युम्न द्रौपदीके पुत्रोंको अपने साथ लिवा ले गये। तदनन्तर पाण्डवोंने परम रमणीय द्वैतवनमें प्रवेश किया ॥ १५३-१५४ ॥ धर्मराजस्य चात्रैव संवादः कृष्णया सह । संवादश्च तथा राज्ञा भीमस्यापि प्रकीर्तितः ॥ १५५ ॥ इसी पर्वमें युधिष्ठिर एवं द्रौपदीका संवाद तथा युधिष्ठिर और भीमसेनके संवादका भलीभाँति वर्णन किया गया है ॥ १५५ ॥ समीपं पाण्डुपुत्राणां व्यासस्यागमनं तथा । प्रतिस्मृत्याथ विद्याया दानं राज्ञो महर्षिणा ॥ १५६ ॥ महर्षि व्यास पाण्डवोंके पास आये और उन्होंने राजा युधिष्ठिरको प्रतिस्मृति नामक मन्त्रविद्याका उपदेश दिया ॥ १५६ ॥ गमनं काम्यके चापि व्यासे प्रतिगते ततः । अस्त्रहेतोर्विवासश्च पार्थस्यामिततेजसः ॥ १५७ ॥ व्यासजीके चले जानेपर पाण्डवोंने काम्यकवनकी यात्रा की। इसके बाद अमिततेजस्वी अर्जुन अस्त्र प्राप्त करनेके लिये अपने भाइयोंसे अलग चले गये ॥ १५७ ॥ महादेवेन युद्धं च किरातवपुषा सह । दर्शनं लोकपालाना मस्त्रप्राप्तिस्तथैव च ॥ १५८ ॥ वहीं किरातवेशधारी महादेवजीके साथ अर्जुनका युद्ध हुआ, लोकपालोंके दर्शन हुए और अस्त्रकी प्राप्ति हुई ॥ १५८ ॥ महेन्द्रलोकगमनमस्त्रार्थे च किरीटिनः । यत्र चिन्ता समुत्पन्ना धृतराष्ट्रस्य भूयसी ॥ १५९ ॥ इसके बाद अर्जुन अस्त्रके लिये इन्द्रलोकमें गये यह सुनकर धृतराष्ट्रको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १५९ ॥