भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

पौरानुगमनं चैव धर्मपुत्रस्य धीमतः ॥ १४३ ॥ जिस समय महात्मा पाण्डव वनवासके लिये यात्रा कर रहे थे, उस समय बहुत-से पुरवासी लोग बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ १४३ ॥ अन्नौषधीनां च कृते पाण्डवेन महात्मना । द्विजानां भरणार्थं च कृतमाराधनं रवेः ॥ १४४ ॥ महात्मा युधिष्ठिरने पहले अनुयायी ब्राह्मणोंके भरण-पोषणके लिये अन्न और ओषधियाँ प्राप्त करनेके उद्देश्यसे सूर्यभगवान्‌की आराधना की ॥ १४४ ॥ धौम्योपदेशात् तिग्मांशुप्रसादादन्नसम्भवः । हितं च ब्रुवतः क्षत्तुः परित्यागोऽम्बिकासुतात् ॥ १४५ ॥ त्यक्तस्य पाण्डुपुत्राणां समीपगमनं तथा । पुनरागमनं चैव धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ १४६ ॥ कर्णप्रोत्साहनाच्चैव धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । वनस्थान् पाण्डवान् हन्तुं मन्त्रों दुर्योधनस्य च ॥ १४७ ॥ महर्षि धौम्यके उपदेशसे उन्हें सूर्यभगवान्‌की कृपा प्राप्त हुई और अक्षय अन्नका पात्र मिला। उधर विदुरजी धृतराष्ट्रको हितकारी उपदेश कर रहे थे, परंतु धृतराष्ट्रने उनका परित्याग कर दिया। धृतराष्ट्रके परित्यागपर विदुरजी पाण्डवोंके पास चले गये और फिर धृतराष्ट्रका आदेश प्राप्त होनेपर उनके पास लौट आये। धृतराष्ट्रनन्दन दुर्मति दुर्योधनने कर्णके प्रोत्साहनसे वनवासी पाण्डवोंको मार डालनेका विचार किया ॥ १४५—१४७ ॥ तं दुष्टभावं विज्ञाय व्यासस्यागमनं द्रुतम् । निर्याणप्रतिषेधश्च सुरभ्याख्यानमेव च ॥ १४८ ॥ दुर्योधनके इस दूषित भावको जानकर महर्षि व्यास झटपट वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने दुर्योधनकी यात्राका निषेध कर दिया। इसी प्रसंगमें सुरभिका आख्यान भी है ॥ १४८ ॥ मैत्रेयागमनं चात्र राज्ञश्चैवानुशासनम् । शापोत्सर्गश्च तेनैव राज्ञो दुर्योधनस्य च ॥ १४९ ॥ मैत्रेय ऋषिने आकर राजा धृतराष्ट्रको उपदेश किया और उन्होंने ही राजा दुर्योधनको शाप दे दिया ॥ १४९ ॥ किर्मीरस्य वधश्चात्र भीमसेनेन संयुगे । वृष्णीनामागमश्चात्र पञ्चालानां च सर्वशः ॥ १५० ॥ इसी पर्वमें यह कथा है कि युद्धमें भीमसेनने किर्मीरको मार डाला। पाण्डवोंके पास वृष्णिवंशी और पांचाल आये। पाण्डवोंने उन सबके साथ वार्तालाप किया ॥ १५० ॥ श्रुत्वा शकुनिना द्यूते निकृत्या निर्जितांश्च तान् । क्रुद्धस्यानुप्रशमनं हरेश्चैव किरीटिना ॥ १५१ ॥